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यह धुआं क्यों हुआ ?

देश की राजधानी दिल्ली में स्मॉग (कोहरे और धुएं का मिश्रण) ने कहर क्या बरपाया हरियाणा में आपातकाल जैसे हालात पैदा हो गए। इन दिनों हरियाणा के तमाम अधिकारियों के जिम्मे एक ही काम है और वह यह जांच करना कि कहीं किसानों ने खेत में पुराली में आग तो नहीं लगा दी। अभी तक 1429 किसानों के खिलाफ इस आरोप में मामले दर्ज किए गए हैं। दिल्ली में स्मॉग के लिए हरियाणा और पंजाब को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। किसानों पर कार्रवाई के मामले में हरियाणा के उलट पंजाब में हालात थोड़े अलग हैं क्योंकि वहां अगले साल चुनाव होने वाले हैं, इसलिए प्रदेश सरकार ने किसानों पर सख्ती नहीं की। उलटे केंद्र सरकार को ही कठघरे में खड़ा कर दिया है। किसान सवाल उठा रहे हैं कि दिल्ली में स्मॉग की वजह वे कैसे हैं? यदि हैं भी तो पुराली की समस्या से निपटने का इंतजाम क्या है?

हर साल की तरहइस बार भी हरियाणा में 105 लाख टन पुराली में से 90 फीसदी को खेतों में ही जला दिया गया। पंजाब में भी तकरीबन 200 लाख टन पुराली खेतों में जलाई गई। जाहिर है कि इससे उठने वाले धुंए व कार्बन डाइआॅक्साइड से हवा में प्रदूषण की मात्रा बढ़ गई। सरकार भी उस वक्त प्रयास कर रही है जब पानी सिर से ऊपर गुजर चुका है। ऐसे में न तो प्रदूषण कम हो रहा है और न किसानों की मुश्किलें। उन्हें नुकसान अलग हो रहा है क्योंकि धान की कटाई के बाद किसानों को तुरंत ही गेहूं की बिजाई करनी होती है। उनके पास समय कम होता है इसलिए खेत से पुराली को हटाने के लिए वे इसमें सीधे आग लगा देते हैं।

क्यों है पुराली की समस्या
दरअसल, हरियाणा-पंजाब के किसानों की दिक्कत यह है कि उन्हें धान की कटाई के लिए मजदूर नहीं मिलते। हाथ से कटाई में वैसे भी काफी समय लग जाता है। एक एकड़ धान यदि हाथ से काटा जाए तो कम से कम चार दिन लगेंगे। यही काम हारवेस्टर मशीन एक घंटे में कर देती है। इससे धान का नुकसान भी कम होता है। इसमें दिक्कत यह रहती है कि हारवेस्टर से जो पुराली बचती है उससे निपटने का कोई सस्ता इंतजाम नहीं है। ऐसे में किसानों के पास एक ही उपाय बचता है कि वे सीधे इसमें आग लगा दें। यह तरीका किसान तब से अपना रहे हैं जब से कटाई मशीन से होने लगी है। हर बार उन्हें चेतावनी दी जाती है। कुछ जगह मामले भी दर्ज होते हैं। इसके बाद बात आई गई हो जाती है। मगर इस बार स्थिति थोड़ी अलग है।

यमुनानगर के किसान हरपाल सिंह कहते हैं, ‘पुराली को खत्म करना बेहद मुश्किल काम है क्योंकि धान की कटाई के बाद किसानों को तुरंत गेहूं की बिजाई करनी होती है। इसके पीछे सोच यह रहती है कि धान की नमी में ही गेहूं की बिजाई कर ली जाए क्योंकि इस मौसम में यदि खेत की सिंचाई कर गेहूं की बिजाई की जाए तो इसमें तकरीबन 15 से लेकर 25 दिन तक लग सकते हैं। पुराली वाले खेत की बुहाई के लिए किसानों को बड़ा ट्रैक्टर चाहिए। ज्यादातर किसान गरीब हैं। वे इसे खरीद ही नहीं सकते। ऐसे में आसान रास्ता बचता है आग लगाना। यही वजह है कि किसान खेत में आग लगा देते हैं।’

पुराली से क्या वास्तव में प्रदूषण फैल रहा
इस पर अभी तक हरियाणा में कोई रिसर्च नहीं हुआ है। हरियाणा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मेंबर सेक्रेटरी एस. नारायणन ने बताया कि इसका कोई सटीक डाटा तो नहीं है लेकिन यह सभी जानते हैं कि कुछ भी जलता है तो उससे प्रदूषण होता ही है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एक अन्य सदस्य ने बताया कि इन दिनों दिल्ली में धुएं के बादल पैदा हो जाते हैं। पंजाब व हरियाणा में किसान खेत में पुराली जलाते हैं। इसलिए यह सोच बनी है कि इसकी वजह पुराली जलाना ही है। यही वजह है कि पुराली जलाने पर राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) ने रोक लगा दी है। लेकिन किसान इस बात से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि धान की पुराली से सिर्फ राख होती है। इससे ज्यादा धुआं तो फैक्ट्रियों से निकल रहा है। प्रदूषण की वजह कुछ और है लेकिन दंडित उन्हें किया जा रहा है।

किसानों का कहना है कि प्रदूषण नियंत्रण के नाम पर सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच रही है। पुराली की समस्या का समाधान क्या हो, इस बारे में सरकार ने कुछ नहीं किया है। जबकि कृषि विभाग और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को धान कटाई से पहले ही इस ओर देखना चाहिए था। किसानों के पास जब पुराली को ठिकाने लगाने का विकल्प ही नहीं होगा तो वे क्या करेंगे? भारतीय किसान यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढूनी ने कहा कि सरकार सस्ती दर पर हैवी मशीनरी किसानों के लिए उपलब्ध कराए तो समस्या सुलझ सकती है।

हरियाणा और पंजाब की हवा में जहरीले कणों की मात्रा औसतन 100 से लेकर 250 तक है। यह तय मानक से ज्यादा तो है लेकिन दिल्ली से बहुत कम। ऐसे में सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि पुराली से यह समस्या है तो फिर पंजाब व हरियाणा में प्रदूषण क्यों नहीं हो रहा है। पर्यावरण के लिए काम कर रही संस्था आकृति के अध्यक्ष अनुज ने बताया कि पुराली से दिल्ली में प्रदूषण का आधार क्या है, इस बारे में कम से कम हरियाणा में तो कोई रिसर्च नहीं हुआ है। 16 अक्टूबर से तो हवा की दिशा भी पाकिस्तान और राजस्थान की ओर है। हरियाणा पर्यावरण विभाग के प्रिंसिपल सेक्रेटरी श्रीकांत वाल्गद भी स्वीकार करते हैं कि इस दिशा में अभी तक काम नहीं हुआ है। पंजाब के साइंस एंड टेक्नोलॉजी विभाग के सेक्रेटरी अनुराग वर्मा ने भी स्वीकार किया कि हवा की दिशा पाकिस्तान व राजस्थान की ओर है। उन्होंने बताया कि हमने यह मुद्दा केंद्रीय पर्यावरण मंत्री अनिल माधव दवे के साथ बैठक में भी उठाया था। अकेले किसान इस प्रदूषण के जिम्मेदार नहीं हैं। हमने उनसे मांग की है कि केंद्र सरकार किसानों को पुराली की समस्या से निपटने के लिए या तो टेक्नोलॉजी दे या फिर धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में इसके लिए प्रति एकड़ 1500 से 2000 रुपये बढ़ा कर दे। इससे किसान पुराली को निपटाने का खर्च वहन कर सकेगा।

कागजों में ही उलझा प्रस्ताव
करीब एक साल पहले हरियाणा के कृषि विभाग ने पुराली जलाने से किसानों को रोकने के लिए 20 करोड़ रुपये का प्रस्ताव प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पास भेजा था, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया कि इससे प्रदूषण कम कैसे होगा। एक साल तक यह फाइल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के दफ्तर में पड़ी रही। हालांकि योजना यह थी कि इस फंड से ऐसी मशीन ली जाए जो पुराली के बंडल बना ले। इन बंडलों को किसान गत्ता व कागज बनाने वाली फैक्टरी को बेच सकते थे। साथ ही इस फंड से ऐसी मशीन किसानों के लिए खरीदी जानी थी जिससे वे पुराली वाले खेत में सीधे बिजाई कर सकें। सरकार की लापरवाही की वजह से यह योजना पूरी नहीं हो सकी। अब किसानों को प्रदूषण के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है।

आत्मघाती है पुराली जलाना
कृषि विशेषज्ञ डॉक्टर अशोक शर्मा ने बताया, ‘खेत में पुराली जलाना किसानों के लिए आत्मघाती कदम है। पहली बात तो यह है कि जब पुराली जलती है तो किसान को मौके पर रहना पड़ता है क्योंकि डर रहता है कि आग भड़क कर दूसरे खेतों में न चली जाए। दूसरी वजह यह है कि इसका जमीन पर बहुत प्रतिकूल असर पड़ता है। आग से जमीन का तापमान बढ़ जाता है। इससे कई तरह के जीवाणु नष्ट हो जाते हैं। जमीन के पोषक तत्व कम हो जाते हैं। साथ ही जमीन बंजर होना शुरू हो जाती है। इसका सीधा असर गेहूं के उत्पादन पर पड़ता है। मगर किसान के पास विकल्प क्या है? यदि पुराली को खेत में ही सड़ा दिया जाए तो यह जमीन के लिए बहुत अच्छी खाद बन सकती है। यह तभी संभव है जब सरकार इसके लिए योजना बनाए। पुराली वाले खेत में गेहूं की सीधी बिजाई संभव नहीं है। इसके लिए स्प्रिंकलर चाहिए। इससे पुराली धीरे-धीरे खेत में ही खाद में तब्दील हो जाएगी। ऐसा हुआ तो गेहूं में रासायनिक खाद डालने की जरूरत कुछ हद तक कम होगी। इससे किसानों का पैसा बचेगा। इस दिशा में योजना बननी चाहिए।’

उनका कहना है, ‘प्रदूषण का हल जुर्माना नहीं बल्कि किसानों के लिए विकल्प उपलब्ध कराना है। अभी क्योंकि हरियाणा में चुनाव नहीं है इसलिए सरकार किसानों पर जुर्माना लगा सकती है। तीन साल बाद जब चुनाव होंगे तो जुर्माना नहीं लगा सकेगी। तब सरकार किसानों को नाराज करने का जोखिम नहीं उठा सकेगी। पंजाब में अभी ऐसा ही हो रहा है। पंजाब में एक भी किसान पर जुर्माना नहीं लगा। लेकिन यह प्रदूषण से निपटने का हल नहीं है। हल है सही और सस्ता विकल्प जो किसान की पहुंच में हो।’

जिम्मेदारी से बच रही सरकार : अशोक अरोड़ा
इनेलो के प्रदेश अध्यक्ष अशोक अरोड़ा ने बताया कि सरकार किसानों पर अपनी जिम्मेदारी डाल कर खुद को बचा रही है। होना तो यह चाहिए कि किसानों की मदद की जाए। इसके लिए कोई योजना समय रहते बननी चाहिए थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पुराली को निपटाने के लिए एनजीटी ने छोटे किसानों को अनुदान देने के निर्देश दिए हैं लेकिन एक भी किसान को यह अनुदान नहीं दिया गया।

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