35ए यानी चाय की प्याली में तूफान

जवाहरलाल कौल।

एक याचिका सर्वाेच्च न्यायालय में कुछ समय पहले दाखिल की गई। न्यायालय ने बस इतना किया कि उस पर विचार करने के लिए प्राथमिक जांच करना स्व्ीकार किया। अगर अदालत को लगे कि इस याचिका पर विचार होना चाहिए तो उसके लिए बड़ी पीठ का चयन करना होगा क्योंकि दो जज इस संवैधानिक विवाद का निर्णय नहीं कर सकते। संविधान से जुड़े किसी मामले में पांच या अधिक न्यायाधीशों की पीठ ही होनी चाहिए। अभी तक कोई पीठ गठित नहीं हुई है। इसके लिए जो प्राथमिक चर्चा छह अगस्त को होनी थी वह भी स्थगित हो गई है और अब वह 17 अगस्त को होगी। यानी अब तक न्यायालय ने यह भी तय नहीं किया है कि जिस विवाद पर याचिका है वह गहन विचार करने लायक है भी कि नहीं। फिर भी कश्मीर घाटी में कुछ लोगों ने हंगामा खड़ा किया है। वे कुछ इस प्रकार प्रशासन और अदालत को धमका रहे हैं कि जैसे कोई सुनामी आ रही है। चाय की प्याली में यह तूफान कुछ ऐसे निहित स्वार्थी तत्त्वों द्वारा उठाया जा रहा है जिनकी निरंकुशता और सत्ता से चिपके रहने की सुविधा खतरे में आ गई है। वे जनता को ऐसे खतरे से भयभीत कर रहे हैं जो है ही नहीं। विवाद तो नया नहीं है और न इसमें कोई नया आयाम जुड़ गया है। फिर भी शोर इतना है कि जैसे कयामत के दिन निकट आने लगे हों।

राज यह है कि जब से विवाद की जड़ रोप दी गई तभी से इसे परदों के पीछे दबाकर रखा गया। बरसोंं बाद तक भी लोगों को कानों कान खबर नहीं मिली कि भारत के संविधान के साथ ऐसी कोई छेड़छाड़ की गई है। जिन्होंंने देश का संविधान बनाया था वे तो जानते थे कि उन्होंने ऐसा कोई अनुच्छेद संविधान में नहीं शामिल कर लिया था, लेकिन हमारी संसद के सदस्यों को भी नहीं पता था कि उनसे पूछे बिना ही कोई कानून अचानक संविधान में घुसपैठ कर चुका है। यहां तक कि वे कानून के कीडेÞ वकील लोग भी अनजान थे। वे सब लोग जिनका उसके साथ वास्ता था अनजान थे तो बाकी समाज को कहां पता चलता। ले दे कर मुट्ठीभर लोग जानते थे जिन्होंने इस कानून को चोरी छिपे यहां स्थापित कर लिया था। इस गोपनीयता को एक विचित्र प्रकार से बनाए रखने का प्रयास किया गया था। संविधान में इसे 35ए की संख्या दी गई, लेकिन इसे न अनुच्छेद 35 के पश्चात स्थान मिला है और न अनुच्छेद 36 से ठीक पहले रखा गया है। यानी जो व्यक्ति संविधान के अनुच्छेद 35 के आगे देखना चाहता हो उसे अनुच्छेद 36 ही मिलेगा, अनुच्छेद 35ए तो नजर से गायब ही रहेगा और धीरे धीरे दिमाग से भी गायब हो जाएगा। वास्तव में इस अनुच्छेद को परिशिष्ट में डाल दिया गया है जहां यदा कदा ही नजर पड़ती है। आम कानून के छात्रों की बहुत सारी पुस्तकों में तो यह होता ही नहीं और जिनमें होता है वहां भी कभी कभी ही लोगों को वहां तक जाने की आवश्यकता पड़ती है। लेकिन कोई भी शातिरी सदा के लिए तो चलती नहीं, कोई न कोई उसे भांप ही लेता है। बात खुल गई तो कुछ लोगों ने अदालत के दरवाजे खटखटाए। लेकिन अदालतें भी ऐसे मामले में उलझना नहीं चाहती थीं और हर बार मामले पहली ही सुनवाई में खारिज कर दिए जाते थे। अब की बार सर्वाेच्च न्यायालय ने ऐसा नहीं किया। दो संगठनों ने इस अनुच्छेद को चुनौती दी तो सर्वोच्च न्यायालय ने उसे देखते ही खारिज नहीं किया। उस पर विचार करने के लिए उपयुक्त कार्रवाई कर ली यानी एक बड़ी पीठ को सौंपने पर विचार होने लगा। कश्मीर के राजनीतिक नेताओं के लिए इतना पर्याप्त था कि अदालत ने इस विवादित कानून पर विचार करने की पहल कर दी है। प्रश्न है कि केवल इतना करने भर से ही मान लिया गया जैसे अदालत इस अनुच्छेद को रद्द करने ही वाली है। हजारों अभियोगों को विचारार्थ पेश करने की स्वीकृति मिल जाती है लेकिन उनमें से बहुत थोड़े ही फैसले की स्थिति तक पहुंचते हैं। तो फिर इतनी घबराहट क्यों?
विवाद अचानक तो नहीं हुआ, लेकिन इतनी लम्बी चुप्पी के पश्चात मामूली सी हरकत भी विस्फोट सी लगती है। जम्मू कश्मीर के मामलों का अध्ययन और शोध करनेवाली एक संस्था ने अनुच्छेद 35ए के परिणामों के बारे में लिखना आरम्भ किया, कुछ बहस आरम्भ हो गई तो पहली बार आम पढ़े लिखे समाज को भी पता चला कि ऐसा कोई अनुच्छेद हमारे संविधान में है। इसी से प्रेरित होकर कुछ अन्य संगठनों ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल कर दी। यह बंदरों के किसी झुंड का जंगल में शेर देखना सा था। बंदरों की ही भांति कई कोनों से प्रतिरोध की चीख पुकार आने लगी। इस कोलाहल में कुछ कोप था तो कुछ घबराहट। उन्हें लग रहा था कि अगर आज तक न्यायपालिका भी चुप ही थी तो अब क्या हो गया कि इस बंद पिटारी का ढक्कन खोला जा रहा है। पता नहीं कि पिटारी से क्या क्या निकल आए। न्यायालय में याचिका ही दाखिल नहीं हुई अदालत ने यह भी उचित समझा कि मामले के बारे में विभिन्न पक्षों से उनकी राय पूछी जाए। दिलचस्प बात है कि दो पक्ष जिनका मत एक ही होना चाहिए अलग अलग रास्ते पर चल पड़े। जम्मू कश्मीर सरकार ने कहा कि इस अनुच्छेद को कदापि नहीं हटाना चाहिए क्योंकि यह जम्मू कश्मीर का भारत के साथ अधिमिलन का आधार है और इसके हटने से वह भी खतरे में पड़ेगा। भारत सरकार, जिसके प्रयास से यह अनुच्छेद संविधान में आया, कोई दो टूक राय नहीं दे पाई और कहा कि यह संवैधानिक मामला है इसलिए अच्छा होगा कि न्यायालय स्वयं ही उचित फैसला करे। यानी उसने अपना पल्ला झाड़ दिया। कुछ अंतराल के पश्चात अब फिर से हल्ला मच गया क्योंकि छह अगस्त को फिर से इस मामले की सुनवाई होनी थी। दिलचस्प बात है कि जो वर्ग इस अनुच्छेद को जैसा का तैसा रखना चाहता है वह मानकर चल रहा है कि अगर पूरी सुनवाई हुई तो यह अनुच्छेद गैरकानूनी सिद्ध हो सकता है- हालांकि अभी तक दोनों पक्षों की ओर से इस अनुच्छेद के बचाव या विरोध के बारे में एक भी बात नहीं कही गई। यहां चोर की दाढ़ी में तिनका तो साफ साफ दिखाई देता है।
इस गुत्थी को समझने की कोशिश हम भी करते हैं। 14 मई 1954 को भारत के राष्ट्रपति ने एक आदेश जारी किया। यह उसी वर्ग का अध्यादेश था जिनका उद्देश्य पहले से पारित कानूनों की व्याख्या करना और उन्हें लागू करने के लिए कायदे तय करना होता है। ऐसे आदेश समय समय पर लागू किए ही जाते हैं। इस आदेश में खासियत यह थी कि यह जम्मू कश्मीर के बारे में था, वह भी अनुच्छेद 370 जुड़ा हुआ। इसमें कई ऐसी बातें हैं जिनसे भारतीय संविधान की कई व्यवस्थाओं का उल्लंघन होता है, भारतीय नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन हाता है। इसके माध्यम से अनुच्छेद 370 को चुनौती देने के अधिकार को भी बाधित किया गया है। यह पहले से पारित अनुच्छेद 370 को लागू करने के लिए बना है। खामियों के बावजूद यह अपने आप में संवैधानिक कार्रवाई ही है। लेकिन दिलचस्प बात यह नहीं है कि भारतीय नागरिकों के मौलिक अधिकारों से छेड़छाड़ की गई है अपितु समस्या यह है कि इस आदेश को गुपचुप संविधान में शामिल कर लिया गया, वह भी बिना संसद की अनुमति के। वही अब अनुच्छेद 35ए बन गया। यह समस्या कितनी गंभीर है, इसके लिए हमें यह जान लेना होगा कि संविधान में संशोधन करने के लिए क्या करना अनिवार्य है। संविधान के अनुच्छेद 368 में नया अनुच्छेद पारित करने का क्रम दिया गया है। संविधान में संशोधन करने की पहल संसद में एक विध्ोयक पेश करने से की जाती है। यह विधेयक दोनों सदनों के दो तिहाई बहुमत से पारित होना चाहिए। संविधान में संशोधन की कोई सीमा नहीं है, लेकिन राष्टÑपति के आदेश में कहा गया है कि ऐसे किसी संशोधन का प्रभाव जम्मू कश्मीर पर नहीं होगा। भारतीय संविधान के अनुसार संविधान में संशोधन करने का अधिकार किसी भी अधिकारी को नहीं है। कोई भी संशोधन संसद में पारित प्रस्ताव को दो तिहाई बहुमत से पारित होने पर ही हो सकता है। सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत याचिका न तो अनुच्छेद 370 को खारिज करने के बारे में है और न ही जम्मू कश्मीर की सरकार या विधानसभा के अधिकारों को कम करने के बारे में।
अगर राष्ट्रपति के आदेश का उद्देश्य अनुच्छेद 370 को लागू करने के बारे में दिशा निर्देश ही है तो उसे संविधान में शामिल करने की आवश्यकता क्या थी? लेकिन अगर आदेश अपने निश्चित लक्ष्य से आगे निकल जाता है और संवैधानिक व्यवस्था में हस्तक्षेप करता है तो उसकी वैधानिकता पर संदेह करना स्वाभाविक है। अपने वर्तमान स्वरूप में वह भारतीय संविधान के कई अनुच्छेदों और उप अनुच्छेदों का उल्लंघन करता है, उन्हें निरस्त करता है या निलंबित करता है। संवैधानिक तौर पर यह संविधान में संशोधन कहलाएगा जो केवल पहले से मान्य प्रकिया का पालन करने से ही हो सकता है अन्यथा नहीं। अनुच्छेद 35ए की वकालत करने वालों की परेशानी का रिश्ता शुद्ध रूप से एक ऐसी राजनीति से है जो लोकतांत्रिक सिद्धांतों को लांघ कर चलती रही है, जिसमें आम जनता के नाम पर व्यक्तिगत या परिवारगत हितों को साधने की सुविधा हो। जम्मू कश्मीर के राजनीतिक नेता आम जनता को दो बातों पर बरगलाने की कोशिश करते रहे हैं। पहला कारण है कि अगर अनुच्छेद 35ए को गैर कानूनी बताया गया तो उससे अनुच्छेद 370 भी प्रभावहीन हो जाएगा और जम्मू कश्मीर को मिलने वाली संवैधानिक सुविधा भी समाप्त हो जाएगी। दूसरा तर्क यह दिया जाता है कि इसको निरस्त करने से कश्मीर का भारत के साथ विलय भी कमजोर हो जाएगा और खतरे में पड़ जाएगा। अनुच्छेद 35 ए को 1954 में लागू किया गया लेकिन कश्मीर का विलय उससे कम से कम छह साल पहले हुआ था। अगर मान लिया जाए कि अनुच्छेद 370 के बाद ही वास्तव में विलय हुआ तो भी यह पूछा जा सकता है कि अनुच्छेद 370 भी कई साल तक तो अनुच्छेद 35ए के बिना चालू था। इस अनुच्छेद के निरस्त होने पर भी अनुच्छेद 370 रहेगा और भारत के साथ विलय पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। अगर अनुच्छेद 35ए को ही अदालत में चुनौती दी जाए तो भी वह उसे संविधान में शामिल करने के संबंध और भारत की संसदीय मर्यादा और संविधान में संशोधन की प्रक्रिया के उल्लंघन के बारे में ही होगी, कश्मीर को मिले कतिपय अधिकारों के बारे में नहीं।
हां, अगर सर्वाेच्च न्यायालय 35ए में प्राप्त अधिकारों को अमान्य करता है तो उसका तात्कालिक लाभ महिलाओं को मिलेगा जिनको अपनी ही सम्पत्ति से वंचित कर दिया जाता रहा है …या फिर उस वाल्मीकि समाज के लिए हो सकता है जिन्हें लालच देकर राज्य में बसाया तो गया था लेकिन उनके अधिकार वहां पर सीमित कर दिए गए- जहां आज विश्व के किसी पिछड़े देश में भी विकास के सबसे निचले पायदान पर खड़े बेसहारा वर्गांे को भी नहीं रखा गया। उनके निवासी प्रमाणपत्र में लिखा गया है कि ‘वे केवल सफाई कर्मचारी के पद के लिए ही आवेदन कर सकेंगे।’ यह जम्मू कश्मीर सरकार को नस्लवाद की निम्नतम कोटि पर ला खड़ा करता है। जो वर्ग आज हल्ला मचा रहा है वह केवल राजनीतिक नेताओं और संपन्न अफसरशाही के ही हितों को ध्यान में रखकर ऐसा कर रहा है। इस वर्ग में उन लोगों का शामिल होना दिलचस्प है जो मानते हंैं कि उन्हें आजादी चाहिए या जो कहते फिर रहे हंैं कि भारत के साथ कश्मीर का विलय हुआ ही नहीं है। वे भारत के साथ रिश्तों को बचाने के लिए छाती पीट रहे हंैं जो रिश्ते मानते ही नहीं।

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