न्यूज फ्लैश

साहित्य- रचनाओं के सूत्रधार पशु-पक्षी

विजय शर्मा।

साहित्य में पशु पक्षियों को पात्र बनाकर रचनाएं हुई हैं, जो हमें मानवीय संवेदनाओं, मनोभावों और तत्कालीन राजनीतिक व सामाजिक व्यवस्था के एक नए रूप से अवगत कराती हैं।

हैदराबाद और डाल्टनगंज में मैंने मधुमक्खियों को मरते हुए देखा, शोध से पता चला है कि यह मोबाइल फोन का असर है। मनुष्य ने पशु-पक्षियों का जीना हराम कर दिया है। अगर पशु मनुष्य की भाषा बोल पाते तो अवश्य अपने बचाव में आवाज उठाते। हां, कई साहित्यकारों ने पशु-पक्षियों के मन की बात कहने की चेष्टा की है। साहित्य में पशु-पक्षी की बात चलते पर मन में सबसे पहले प्रेमचंद की ‘पूस की रात’ के हलकू का जबरा याद आता है। महादेवी का पशु-पक्षी प्रेम और उन पर किया गया उनका लेखन याद आता है। निराला के ‘भिक्षुक’ और भिक्षुक के दो बच्चों से पत्तल झपटने को तैयार कुत्तों का स्मरण हो आता है। प्रेमचंद की ‘दो बैलों की कथा’ कालजयी कृति है। यह कहानी सांकेतिक भाषा में संदेश देती है कि मनुष्य हो या कोई अन्य प्राणी, स्वतंत्रता उसके लिए बहुत महत्व रखती है। यहां संदेश है, स्वतंत्रता पाने के लिए लड़ना पड़े, तो बिना हिचकिचाए लड़ना चाहिए। जन्म के साथ ही मिली स्वतंत्रता को बनाए रखना सबका परम कर्तव्य है। दो बैलों की कथा में बैलों के माध्यम से लेखक ने देशवासियों को संदेश दिया है कि वे आपस का वैर-भाव छोड़कर देश की स्वतंत्रता के लिए प्रयास करें। कहानी में दो मित्र बैल अपनी स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए संघर्ष करते हैं। यह कहानी दो बैलों के बीच में घनिष्ठ भावात्मक संबंध को दर्शाती है। कहानी मनुष्य और जानवर के बीच में उत्पन्न परस्पर संबंध का सुंदर चित्र भी प्रस्तुत करती है।
झूरी के पास हीरा और मोती नाम के दो स्वस्थ और सुंदर बैल थे। वह अपने बैलों से बहुत प्रेम करता था। हीरा और मोती के बीच भी घनिष्ठ संबंध था। एक बार झूरी ने दोनों को अपनी ससुराल खेतों में काम करने के लिए भेज दिया। वहां उन्हें भूखा-प्यासा रखकर खूब काम करवाया जाता। अत: दोनों रस्सी तुड़ाकर झूरी के पास भाग आए। झूरी उन्हें देखकर बहुत खुश हुआ और अब उन्हें खाने-पीने की कमी नहीं रही। दोनों बडेÞ खुश थे। मगर झूरी की स्त्री को यह पसंद नहीं आया। उसने उन्हें खरी-खोटी सुनाई और खाली सूखा भूसा खिलाया। दूसरे दिन साला फिर उन्हें लेने आ गया। फिर उन्हें कड़ी मेहनत करनी पड़ी पर खाने को सूखा भूसा ही मिला।
कई बार काम करते समय गुस्सैल मोती ने गाड़ी खाई में गिरानी चाही तो धैर्यवान हीरा ने उसे समझाया। हीरा की नाक पर जब खूब डंडे बरसाए गए तो मोती गुस्से से हल लेकर भागा, पर पकड़ा गया। कभी-कभी उन्हें खूब मारा-पीटा जाता था। इस तरह दोनों की हालत बहुत खराब थी। वहां एक छोटी-सी बिन मां की बालिका थी। उसकी सौतेली मां उसे मारती रहती थी, बैलों से उसे आत्मीयता हो गई थी। वह रोज दोनों को चोरी-छिपे रोटियां डाल जाती थी। एक दिन बालिका ने उनकी रस्सियां खोल दी। दोनों भाग खड़े हुए। झूरी का साला और दूसरे लोग उन्हें पकड़ने दौड़े पर पकड़ न सके। भागते-भागते दोनों नई जगह पहुंच गए। झूरी के घर जाने का रास्ता वे भूल गए। फिर भी बहुत खुश थे। दोनों ने खेतों में मटर खाई और आजादी का अनुभव करने लगे। फिर एक सांड़ से उनका मुकाबला हुआ। दोनों ने मिलकर उसे मार भगाया, लेकिन खेत में चरते समय मालिक आ गया। मोती को फंसा देखकर हीरा भी खुद आ फंसा। दोनों कांजीहौस में बंद कर दिए गए। वहां और भी जानवर बंद थे। सबकी हालत बहुत खराब थी। जब हीरा-मोती को रात को भी भोजन न मिला तो दिल में विद्रोह की ज्वाला भड़क उठी। एक दिन दोनों ने मिल कर दीवार गिरा दी और दूसरे जानवरों को भगा दिया। मोती भाग सकता था पर हीरा को बंधा देखकर वह भी न भागा।
मोती की खूब मरम्मत कर उसे मोटी रस्सी से बांध दिया गया। एक सप्ताह बाद उन्हें कसाई के हाथों बेच दिया गया। वे समझ गए कि अब उनका अंत समीप है। चलते-चलते अचानक उन्हें लगा कि वे परिचित राह पर आ गए हैं। दोनों उन्मत्त होकर उछलने लगे और दौड़ते हुए झूरी के द्वार पर आकर खड़े हुए। झूरी ने देखा तो खुशी से फूला न समाया। कसाई ने आकर बैलों की रस्सियां पकड़ लीं। झूरी ने कहा कि वे उसके बैल हैं, पर कसाई जोर-जबरदस्ती करने लगा। तभी मोती ने सींग चलाया और कसाई को दूर खदेड़ दिया। थोड़ी देर बाद ही दोनों खुशी से खली-भूसी-चूनी खाते दिखाई पड़े। घर की मालकिन ने भी आकर दोनों को चूम लिया। जब यह कहानी लिखी गई थी तब देश परतंत्र था। परतंत्र देश में प्रतीकात्मक रूप से लिख कर ही जनता को जगाया जा सकता है। प्रेमचंद यही कर रहे थे।
याद आता है किशन चंदर का ‘एक गधे की आत्मकथा’, ‘एक गधे की वापसी’ और ‘एक गधा नेफा में’। किशन चंदर गधे को साधन बनाकर अपनी बात कहने में माहिर हैं। समाज में फैली विषमताओं पर बेबाक व्यंग्य ‘जिसके पढ़ने से बहुतों का भला होगा’। यह उपन्यास देश की सामाजिक-राजनैतिक व्यवस्था पर करारा व्यंग्य है। पद्मभूषण किशन चंदर ने पिछली सदी के पांचवें दशक में उपन्यास ‘एक गधे की वापसी’ लिखा। स्वतंत्र भारत के लोकतंत्र पर यह बहुत मारक व्यंग्य है। उनके गधे की ख्याति ऐसी फैली कि जब लेखकों के एक जलसे में किसी ने उन्हें प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू से मिलवाया तो उन्होंने कहा, ‘हां, हां, जानता हूं, वही गधे वाले।’ यह वाकया किशन चंदर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है।
इस उपन्यास में एक गधा है जो आदमी की भाषा में बोलता है। पाठक सोचने पर मजबूर हो जाता है, आदमी के रूप में गधा है या गधे के रूप में आदमी है। प्रतीकात्मक शैली में लिखा यह उपन्यास भारतीय जीवन के विविध पक्षों को उजागर करता है। इस रोचक उपन्यास में बाराबंकी में र्इंट ढोने वाला एक गधा दिल्ली की यात्रा करता है और वहां एक धोबी के यहां गधे की तरह खटता है। दुर्भाग्य से धोबी को यमुना में मगरमच्छ निगल लेता है। बेवा और यतीम बच्चों की सहायता के लिए गधा दर-दर की ठोकरें खाता है, कहीं सुनवाई नहीं होती है। प्रशासनिक-सरकारी कार्यप्रणाली की धज्जियां उड़ाता कथानक आगे बढ़ता है। यहां तक कि यूनियन वाले भी कोई सहायता नहीं करते हैं। प्रधानमंत्री इस गधे पर सवारी करते हैं और गधा देश-विदेश में प्रसिद्ध हो जाता है। इसके माध्यम से सौंदर्य प्रतियोगिता, साहित्य अकादमी सबकी खबर ली गई है। जाति-धर्म-वर्ग सबकी बखिया उधेड़ता उपन्यास आज भी प्रासंगिक है।
तोता-मैना की कहानियों से हम सब परिचित हैं। पंचतंत्र की कहानियों में पशु-पक्षियों के माध्यम से विष्णु शर्मा ने शरारती राजकुमारों को राह पर लाने का काम किया। कहा जाता है कि इन्हीं के आधार पर ‘ईसप की कहानियां’ (ईसप्स फेबल्स) बनी हैं। ‘पंचतंत्र’ की कहानियों को परिवर्तित करके ‘कथा सरित्सागर’ का सृजन हुआ। महाभारत-रामायण में पशु-पक्षियों की कहानियां हैं। इनसे मनोरंजन होता है, सीख मिलती है, जीवन के विविध रूपों के दर्शन होते हैं। समकालीन हिंदी के एक प्रमुख कहानीकार सत्यनारायण पटेल ने ‘तीतर फांद’ में तीतर को प्रतीक रूप में रख कर आज के भारत की सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक स्थितियों को चित्रित किया है। वे अपने डुग्गू को बहुत प्यार करते हैं, शायद कभी उसे माध्यम बना कर भी कहानी लिखें। हिदी लेखक हरनोट की ‘बिल्लियां बतियाती हैं’। इंग्लिश में रस्किन बॉन्ड ने पशु-पक्षियों पर खूब लिखा है। जॉय एडमसन की ‘बोर्न फ्रÞी’ पर फिल्म बनी है। साहित्य में घोड़ों पर खूब लेखन मिलता है।
थॉमस मान ने अपने कुत्ते बशान को केंद्र में रख कर जो रचना की है वह विश्व साहित्य में अप्रतिम है। माना जाता है कि कुत्ते के मस्तिष्क का इससे अच्छा अध्ययन विश्व साहित्य में नहीं है जबकि कुछ लोग इसे आदमी के दिमाग का सर्वोत्तम अध्ययन करार देते हैं। मान अपने इस कुत्ते को धीरे-धीरे प्रेम करने लगते हैं, उसकी समझदारी, स्वामिभक्ति और ऊर्जा के प्रशंसक हो जाते हैं। वह खरगोश, हिरण और गिलहरी का पीछा करता है, गिरी हुई शाखाओं, पत्तों, पत्थरों का अवलोकन करता है। यह सब देख कर मान का इस छोटे बाल वाले जर्मन पॉइंटर से एक अटूट रिश्ता कायम हो जाता है। मान कुत्ते से इतने प्रभावित होते हैं कि उसके आंतरिक जीवन पर ध्यान केंद्रित करने लगते हैं। उन्हें अफसोस होता है कि वे इस मित्र के निजी संसार से पूरी तरह परिचित नहीं हो सकते हैं। उन्हें मनुष्य और बाकी प्रकृति के शाश्वत विभाजन का भान हुआ। बशान उनकी जिंदगी का अभिन्न अंग बन जाता है, उनके जीवन को अर्थवत्ता प्रदान करता है। जब कुछ समय के लिए उनका इस अमूल्य जीव से बिछोह होता है तो वे खुद को बहुत अकेला पाते हैं। यहां प्रेम और उसकी जटिलता को देखा जा सकता है।
बैलों, गधों और कुत्तों के बाद अब मैं बात कर रही हूं जापानी उपन्यासकार ताकाशी हिराइड की किताब ‘द गेस्ट कैट’ की। कवि, उपन्यासकार और आलोचक ताकाशी की बहुत कम किताबों का अंग्रेजी में अनुवाद हुआ है। वे अंग्रेजी पढ़ लिख सकते हैं। अंग्रेजी में आते ही ‘द गेस्ट कैट’ बेस्टसेलर बन गई। यह हुआ पाठकों के द्वारा। पाठकों ने इसे पढ़ा, उन्हें अच्छा लगा और उन्होंने अपने दोस्तों को बताया। इस तरह किताब की ख्याति फैली, किताब हाथों-हाथ बिकी। जापान में तो इसे पुरस्कार मिल चुका है।
अक्सर शादीशुदा युगल कुछ सालों बाद एक-दूसरे के प्रति ठंडे पड़ जाते हैं। उनके बीच की ऊष्मा गायब हो जाती है। उनके पास एक-दूसरे से साझा करने के लिए, बोलने-बतियाने के लिए कुछ नहीं रह जाता है। खास कर जब दोनों कामकाजी हों और नि:संतान भी। ऐसे ही एक अनाम दम्पति हैं इस उपन्यास में। पति लेखक है और पत्नी प्रूफ-रीडर। वे टोकियो के एक बहुत शांत इलाके में रह रहे हैं। घर बड़ा नहीं है मगर बागीचा और पूरी जमीन खूब बड़ी है। कहते हैं, तीस की उम्र बहुत क्रूर होती है। यह आपको सतह से उठा कर समुद्र की कठिनाई में खींच ले जा सकती है, यहां तक कि मृत्यु में भी। बीमारी, मृत्यु की खबर मिलनी शुरू हो जाती है। उम्र के इसी क्रूर दौर से ये पति-पत्नी गुजर रहे हैं।
एक दिन पड़ोसी की बिल्ली छिबि उनकी रसोई में मेहमान की तरह चली आती है। नायक को बिल्लियों से कोई लगाव नहीं है। जब वह अपने दोस्तों को बिल्लियों पर लाड़ लुटाते देखता है तो उसे वितृष्णा होती है। मेरे एक दोस्त का घर कुत्ते-बिल्लियों से भरा हुआ है। उनके घर का नाम ही ‘कैट पैलेस’ और ‘डॉग हैवन’ है। बिल्ली पर लिखने वाले ताकाशी अकेले लेखक नहीं हैं। नोबेल से पुरस्कृत लेखिका डोरिस लेसिंग ने ‘आॅन कैट्स’ लिखा है। उनके यहां बिल्लियां हैं, साथ ही जंगली बिलाड़ भी। बाज, उल्लू और ढेर सारे पशु-पक्षी हैं। इसकी सेटिंग अफ्रÞीका है। जबकि ‘द गेस्ट कैट’ की सेटिंग जापान है। छिबि बहुत सुंदर जीव है, बिल्लियों में रत्न। बिल्ली स्वभाव में कुत्ते से बहुत भिन्न होती है। वह किसी की गुलामी नहीं करती है, किसी के सामने पूंछ नहीं हिलाती है। बिल्ली का स्वभाव नि:संग होता है। छिबि आती है, खाती है और चली जाती है। अगले दिन फिर आती है, उसके अगले दिन फिर। अब वह केवल रसोई में नहीं रहती है। खास समय पर आती है, खाती है और सोफे पर आराम फरमाती है। फिर उठ कर चली जाती है।
छिबि के साथ इस युगल के घर में थोड़ी-सी खुशी भी चली आती है। अचानक उनकी जिंदगी बदलने लगती है। अब सारा समय वे टेबल पर सिर झुकाए अपने-अपने काम में डूबे नहीं रहते हैं। कुछ दिन में वे छिबि के लिए खरीदारी करने लगते हैं। साथ-साथ घूमने-बतियाने लगते हैं। छोटी-छोटी बातें साझा करने लगते हैं। साथ पब जाते हैं, बागीचे की खूबसूरती निहारते हैं, बागीचा जो बहुत योजना के साथ लगाया गया है जहां हर मौसम में अलग-अलग फूल खिलते हैं। दोनों टेडपोल्स को मेढकों में परिवर्तित होते देखते हैं। हवा में उड़ती हुई ड्रैगनफ़्लाई जोड़ा बनाती है, उसमें उन्हें भग्न हृदय की छवि नजर आती है। वे छिबि के साथ खेलते हैं। जिंदगी खूबसूरत हो उठती है। बताना मुश्किल है कि छबि उनकी है, या उनके पड़ोसी की।
छिबि के आने से पति अपना उपन्यास लिखना शुरू कर देता है। यह आत्मकथात्मक उपन्यास का आभास देता है। पाठक देखता है कि कथावाचक जो कह रहा है वह वास्तव में उसकी नई किताब है। मगर सब दिन एक समान नहीं होते हैं। परिवर्तन जीवन का अटूट नियम है। कुछ ऐसा होता है कि अचानक यह परिकथा उदासी और हताशा में डूब जाती है। कथावाचक के साथ पाठक के मुंह से भी निकलता है, ‘भला उसने ऐसा कैसे किया?’ पाठक का रहस्य से सामना होता है और वह सोचने पर मजबूर हो जाता है। वास्तविक उदासी के विषय में लिखना संभव नहीं है। हां, ताकाशी ने यह असंभव काम संभव किया है। क्या होता है? कैसे होता है? क्यों होता है? यह आप स्वयं पढ़ कर जानें, अनुभव करें।
इस लघु उपन्यास ‘द गेस्ट कैट’ का काल पिछली सदी का आठवां दशक है जब सब चीजों के बाजार भाव चढ़े हुए हैं। घरों और रीयल इस्टेट के दाम आकाश छू रहे हैं। चारों ओर आर्थिक असुरक्षा मुंह बाए खड़ी है। हां, मध्यकाल, मेकियावेली का संदर्भ भी यहां आया है, बीच-बीच में फिलॉसफी का छौंक लगाता यह उपन्यास अवलोकन क्षमता, हास्य और बुद्धि का अद्भुत संगम है। नाजुक कलात्मक, परिवर्तन पर ध्यान लगाता यह उपन्यास हमें भी संवेदनशील और निरीक्षण में कुशल बनाता है।
और जॉर्ज आॅरवल ने तो पूरा ‘एनीमल फॉर्म’ (पशु बाड़ा) ही रच दिया है। यह जॉर्ज आॅरवल की कालजयी रचना है। 1945 में प्रकाशित यह लघु उपन्यास सुअरों को केंद्र में रख कर चलता है। बिहार के मोतिहारी में जन्मे जॉर्ज आॅरवल का मूल नाम एरिक आर्थर ब्लेयर था। 1903 में जन्मा एरिक जब मात्र एक साल का था उसकी मां उसे ले कर इंग्लैंड चली गई। इंडियन सिविल सर्विस से रिटायर हो कर पिता भी बाद में वहीं चले गए। आॅरवल अपने इस उपन्यास को फेयरी टेल कहते हैं मगर यह उससे कई गुणा अधिक प्रभावशाली और महत्वपूर्ण कथा है। प्रकाशन के तत्काल बाद इसका कई भाषाओं में अनुवाद हुआ। युटोपिया के स्वप्न को भंग करता उपन्यास आज भी मानीखेज है। उपन्यासकार साम्यवादी आंदोलन में आए भ्रष्टाचार की पोल खोलता है। दिखाता है कि ऐसे आंदोलन के नेतृत्व में भी स्वार्थपरता थी जिसके कारण यह अपने लक्ष्य से भटक गया।
सर्वहारा वर्ग को सत्ता सौंपने के लिए साम्यवादी क्रांति प्रारंभ हुई थी जिसका अंत बहुत त्रासद हुआ। पशु बाड़े का गणतंत्र इन्हीं उद्देश्यों पर अपनी व्यवस्था केंद्रित करता है। इस बाड़े का एनीमलिज्म वस्तुत: सोवियत रूस के 1910-1940 की राजनैतिक-सामाजिक स्थितियों का प्रतीकात्मक चित्रण है। फंतासी के रूप में यह एक एनीमल फॉर्म की कहानी कहता है। जहां फॉर्म के पशु अपने मालिक के विरुद्ध विद्रोह करते हैं और पूरा शासन अपने हाथ में ले लेते हैं। यहां जानवरों में सुअर सबसे चालाक जानवर है। अत: वे ही इस विद्रोह का नेतृत्व करते हैं। शासन हाथ में आने पर ये सुशासन के नियम तय करते हैं। लेकिन जल्द ही ये सुअर अपने पूर्व मालिक आदमी का रंग-ढंग अपना लेते हैं और अपने लाभ के लिए अन्य जानवरों का शोषण प्रारंभ कर देते हैं। नियमों को अपनी स्वार्थपरता के लिए तोड़-मरोड़ते हैं। जैसे कि एक नियम था, ‘सब जानवर बराबर हैं।’ जिसे बदल कर, ‘सब जानवर बराबर हैं लेकिन कुछ जानवर दूसरों से अधिक बराबर हैं।’ आज जनतंत्र में शासक वर्ग के दुमुंहेपन को दिखाने के लिए इस वाक्य का प्रयोग बराबर किया जाता है।
इस प्रकार पशु-पक्षियों को केंद्र में रख कर बहुत महत्वपूर्ण रचनाएं हुई हैं। 

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1 Comment on साहित्य- रचनाओं के सूत्रधार पशु-पक्षी

  1. Vijay Sharma // 01/12/2018 at 6:14 pm // Reply

    Thank you for publishing.

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