गांवों की गलियों में पहुंची सरकार

ओपिनियन पोस्ट
Mon, 04 Jun, 2018 15:35 PM IST

उमेश सिंह

खेत की माटी में किसान का कर्मयज्ञ। श्रम से सने पसीने की बूंदें गिरती हैं तो फसलों की बालियां लहलहाती हैं। नगर का पेट इसी खेत की मिट्टी से उपजे अन्न से भरता है। लेकिन अन्न उपजाने वाला खुद पेट के भूगोल में उलझा है। उसे राशन, आवास, बिजली, चिकित्सा, शिक्षा और पानी चाहिए। उसे शौचालय की भी जरूरत है। पेंशन व कुकिंग गैस भी चाहिए। भगवा सरकार पात्र जरूरतमंदों को कल्याणकारी योजनाओं की छतरी की छाया देना चाहती है। लेकिन ‘विकास की गंगा’ गोमुख से निकल न जाने किन जटाओं में उलझ जाती है। गांव-गिरांव के गरीबों तक ठीक से पहुंचने से पहले ही सूख जाती है। ग्राम स्वराज्य अभियान का मकसद उन्हीं ‘उलझी हुई जटाओं में कैद विकास की गंगा’ की पहचान करना है। आखिर उसे किन-किन जटाओं में जबरन कैद कर लिया गया है। पहचान के बाद उसे वहां से मुक्त कराना है। ‘गुलाबी मौसम’ वाले सरकारी रिपोर्ट को दरकिनार कर भगवा सरकार ने गरीबों से सीधा संवाद किया। जनप्रतिनिधि, नौकरशाह और गांव के लोग। सब आमने-सामने। ग्राम स्वराज अभियान के जरिये भाजपा ने एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश की है। उसके पांव तो गांव-गिरांव-गरीब के यहां हैं लेकिन नजर दिल्ली की ओर है। दलित और पिछड़ा बहुल आबादी वाले गांवों को भगवा गढ़ बनाने की चाहत है। एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम को कमजोर करने के आरोपों से संघर्ष कर रही भाजपा को दलितों के बीच ठीक से पैठ बनाने की फिक्र है। जनता की नब्ज टटोलने के लिए यह कारगर पहल है लेकिन ग्राम स्वराज अभियान पर बसपा के प्रदेश अध्यक्ष राम अचल राजभर ने कहा कि ‘यह सिर्फ दलितों को रिझाने के लिए किया गया नाटक है, लेकिन दलित समाज इन सब झूठे कर्मकांडों से गुमराह होने वाला नहीं है।’
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र नाथ पांडेय ने पूरा के सरेठी गांव में रात्रि चौपाल लगाई तथा सुबह प्रदीप वर्मा के यहां चारे की मशीन भी हाथ से चलाई। कांशीराम कोरी और मनोज कोरी का घर अग्नि की चपेट में आ गया था। मौके पर ही उन्हें चेक दे दिया गया। तीस लोगों को नि:शुल्क बिजली कनेक्शन मौके पर ही दिए गए। मीरा कोरी, मंगरा पासवान और बलराम पासवान आदि ने कहा कि बिजली के लिए दौड़ लगा रहे थे, नेता जी का कार्यक्रम लगते ही हम लोगों की सूची तैयार की जाने लगी। काश ऐसे हर गांव में सरकार जाती तो सभी गांवों का भला हो जाता। शौचालय की मांग कई लोगों ने सामूहिक रूप से की। इसका असर यह हुआ कि उनके जाने के बाद गांव में मौके पर शौचालय के लिए बीस गड्ढे खोदे जा चुके हैं और तकरीबन 25 गड्ढे और खोदे जाने की तैयारी है। गांव के जगराम कोरी, जंजाली सिंह, ओमप्रकाश कोरी, सुंदर कोरी और राजेंद्र कोरी आदि ने गड्ढों को दिखाते हुए कहा कि यह सब काम प्रदेश अध्यक्ष के गांव में रुकने के कारण ही हो रहा है। ये सभी बेहद खुश नजर आ रहे थे। इन सभी को पहली किश्त के रूप में छह-छह हजार रुपये मिल चुके हैं। सरेठी गांव में खड़ंजा और नाली की मरम्मत का कार्य शुरू हो चुका है। गांव के राजकरन कनौजिया ने कहा कि जो काम वर्षों से नहीं हो रहा था, एक झटके में हो गया। भाजपा के पूरा मंडल अध्यक्ष हरिभजन गौड़ का कहना है कि ‘सरेठी गांव कायाकल्प होने की प्रक्रिया में है। सत्तावन आवास स्वीकृत हो चुके हैं, यह संख्या अभी और बढ़ सकती है। चौपाल में कुछ लोग छुट्टा जानवरों की समस्या उठाना चाहते थे, लेकिन वे बोल नहीं पाए। डॉ. राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य मनोज दीक्षित ने कहा कि ‘वर्ष 1990-91 में मेरा रिसर्च पेपर ‘प्रशासन गांवों की ओर’ प्रकाशित हुआ था। उसमें मैंने लिखा है कि गांवों में सबसे बड़ी समस्या रेवन्यू कोर्ट के मुकदमे हैं। इन मुकदमों को खत्म करना जरूरी है। यह कार्य थोड़ी सी सतर्कता से संभव है। गांव से लेकर जिला तक का पूरा प्रशासन मौके पर बैठे और निस्तारण कर दे। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री भैरो सिंह शेखावत पहले ऐसे व्यक्ति हैं जो प्रशासन को गांवों की ओर लेकर गए थे। उनके समय रात्रि प्रवास कोई इश्यू ही नहीं था। वह चलते रहते थे और एक समय वह भी आया कि जब सत्ताइस जिलों को उन्होंने कवर कर लिया।’ दीक्षित ने लखीमपुर के अपने गांव विजवा का हवाला देते हुए कहा कि वहां हमने रूरल आउटसोर्सिंग का प्रयोग किया। मौके पर गांव की लैब में पचास कम्प्यूटर हैं और युवा गांव में ही काम करके रुपये कमा रहे हैं।
फैजाबाद जिले के प्रभारी मंत्री सतीश महाना ने मसौधा ब्लाक के बल्लीपुर में चौपाल लगाई थी। परिषदीय स्कूल के पश्चिम चकमार्ग पर पुलिया की जरूरत वर्षों से थी। उन्होंने आश्वासन दिया और उनके जाने के बाद पुलिया बनाने के लिए नपाई-जोखाई का कार्य शुरू हो गया। प्रधान प्रदीप कुमार ने बताया, ‘चौपाल से गांव को लाभ मिला है। जिस काम के लिए कर्मचारियों और अधिकारियों का चक्कर लगाना पड़ता था, उसे अब वे खुद कागज लेकर कर रहे हैं।’ उन्होंने कहा कि ‘प्रधानमंत्री आवास के लिए कृष्ण कुमार मिश्रा, रेशमा, कृष्णावती, गुड़िय़ा और रीता तथा शौचालय के लिए हृदयराम, शिव गोपाल, राजकुमार, हरिशंकर और बीपीएल कार्ड के लिए कविता सिंह तथा गीता आदि का नाम जिला मुख्यालय को गया है।’ उन्होंने कहा कि अधिकारी खुद ही सूची बनवाएं और शीघ्र इन योजनाओं का लाभ दिलाने का आश्वासन दिया। रेशमा और कृष्णावती के स्वर में भरोसा झलकता है- जब वर्षांे से लटका पुलिया का काम शुरू हो गया तो हमें उम्मीद है कि हम लोगों को आवास भी मिल जाएगा। हृदयराम और शिवगोपाल ने कहा कि पहली बार लगा कि सरकार खुद हमारे दरवाजे पा आ गई और हालचाल पूछ रही है। चौपाल के दौरान ऐतिहासिक भरतकुंड का मामला प्रभारी मंत्री के सामने गूंजा। अरविंद कुमार, तेज बहादुर यादव और पंकज सिंह आदि ने लिखित शिकायत कर भरतकुंड के पेड़ों को वन विभाग की मिलीभगत कर काटने और बेचने का आरोप लगाया। इन लोगों ने फरवरी 2018 में पीएम और सीएम पोर्टल पर शिकायत भी की थी। आरोप था कि जांच में लीपापोती की गई है। मंत्री ने निष्पक्ष जांच कराने का आश्वासन दिया है जिसके कारण पेड़ काटने वालों में बेचैनी और घबराहट बढ़ गई है। राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन मुक्त विश्वविद्यालय इलाहाबाद के कुलपति प्रो. कामेश्वरनाथ सिंह ने कहा, ‘गांवों का जीवन निर्धनता, निरक्षरता और विवशता का है। दरअसल आजादी के बाद से बनी योजनाएं सही ढंग से गांवों तक पहुंची ही नहीं। उन्हें पहुंचाने की दिशा में ग्राम स्वराज अभियान एक प्रयास है। देश में कुल साढ़े छह लाख गांव हैं। हर गांव में एक साथ नहीं पहुंचा जा सकता है। केंद्र सरकार ने आदर्श सांसद गांव की पहल कर देश में तकरीबन चार हजार गांवों को आधारभूत सुविधाओं से लैस करने की कोशिश की है। इसी क्रम में ग्राम स्वराज अभियान भी है। यह संपर्क-संवाद कार्यक्रम है जिसमें वंचित वर्गों तक सरकार पहुंच रही है। पंचसितारा होटलों में, व्याख्यानों में लच्छेदार शब्द जरूर पैदा हो जाते हैं, लेकिन गांव तक उन योजनाओं की ठीक से पहुंच नहीं हो पाती है। अभियान के जरिये सरकार ने वंचितों को उनके हित में चलाई जाने वाली योजनाओं का लाभ दिया है।’ प्रो. सिंह ने कहा, ‘गंगा-जमुना के उर्वर मैदानी क्षेत्र में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग विकसित किए जाने की जरूरत बताई गई है जिससे यह क्षेत्र भी आर्थिक खुशहाली को प्राप्त कर सके।’ उन्होंने कहा कि ‘धरती बांझ तो है नहीं। हर गांव की मिट्टी की जांच के बाद कृषि वैज्ञानिक यह तय करें कि कौन सी फसल यहां के लिए उपयुक्त है।’
भाजपा अभियान की सफलता को लेकर खुश है और दूसरे चरण में इसे एक बार फिर चलाने को लेकर सहमति बन रही है लेकिन दूसरी ओर बसपा और सपा दोनों ने दलित बहुल बस्तियों में रात्रि चौपाल को सियासी ड्रामा बताया। बसपा के प्रदेश अध्यक्ष रामअचल राजभर ने कहा, ‘भाजपा दलितों की इतनी बड़ी हितैषी है तो क्यों नहीं पदोन्नति में आरक्षण लागू कर देती। प्रदेश में दलितों का उत्पीड़न बढ़ गया है। बांदा जिले में दलित के बेटे की मूंछ सिर्फ इसलिए उखाड़ दी गई क्योंकि वह दूसरे के खेत में काम करने नहीं गया। लोकसभा चुनाव को लेकर भाजपा घबराहट में है और इसी बेचैनी में यह अभियान चला रही है। दलित अब समझदार हो गया है। इनके झांसे में फंसने वाला नहीं है।’ समाजवादी पार्टी की छात्र सभा के राष्टीय अध्यक्ष अनिमेष प्रताप सिंह ‘राहुल’ ने कहा, ‘गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में मिली पराजय से भाजपा उबर नहीं पा रही है। अगले लोकसभा चुनाव के लिए बीजेपी पिछड़ों और दलितों को मनाने की कवायद में जुटी है और इसी क्रम में दलित आबादी वाले गांवों में रात्रि चौपाल का आयोजन किया। लेकिन जनता के सवालों को मंत्री झेल नहीं पा रहे हैं। चौपाल में मंत्रियों से गांव वाले तीखे सवाल कर रहे हैं। चौपाल सकुशल निपट जाए, इसके लिए चौपाल में शिरकत करने वालों की गुपचुप सूची पहले से ही बना दी जाती थी। इसके बावजूद कमोबेश हर चौपाल में आक्रोश दिखा। यह संकेत है कि भाजपा की हालत पहले से कमजोर हो गई है, जिसका फायदा सपा को मिलेगा।’

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बेशऊर सियासी करतबों व बिगड़े बोल ने कराई किरकिरी
ग्राम स्वराज अभियान के तहत दलितों के घर खाना खाने को लेकर भाजपा के कई नेता सुर्खियों में रहे। कुछ ने अपनी जुबान से अभियान की किरकिरी कराई तो कई दलितों के घर पहुंचे लेकिन अपनी सुविधा भरी जिंदगी साथ लेकर। पैकेटबंद पकवान लेकर पहुंचे, खोला, खाया और फिर सो गए। नींद भी अच्छी से आए, इसके लिए कूलर, पंखा आदि सेवाओं की आउटसोर्सिंग की गई। मंत्री जी के सुबह जाते ही आउटसोर्सिंग सेवाएं भी समाप्त हो गर्इं। विवादित बयानों और बेशऊर करतबों के कारण भाजपा को अपने विरोधियों के आरोपों को झेलना पड़ा। बेसिक शिक्षा मंत्री अनुपमा जायसवाल ने कहा कि भाजपा नेता मच्छरों के काटने के बावजूद दलितों के घर जा रहे हैं। सरकारी नीतियां हर वर्ग के विकास और उत्थान के लिए बनाई गई हैं और इसको प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए मंत्री लगातार दौरा कर रहे हैं। यह दौरा तब है, जब उन्हें पूरी रात मच्छर काटते हैं। केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने दलित को लेकर बहुत ही मार्मिक और दार्शनिक बयान दिया लेकिन इस बयान की भी खूब आलोचना हुई। उमा भारती ने कहा, ‘हम भगवान राम नहीं हैं जो दलितों के साथ भोजन करेंगे तो वे पवित्र हो जाएंगे।’ उन्होंने दलितों के साथ खाना खाने से इनकार करते हुए महत्वपूर्ण तर्क रखा कि जब दलित हमारे घर आकर साथ बैठकर भोजन करेंगे, तब हम पवित्र हो पाएंगे। दलित को जब मैं अपने घर में अपने हाथों से खाना परोसूंगी तब मेरा घर धन्य होगा। गौरतलब है कि आखिरकार आज भी शबरी उसी हालत में क्यों है? शबरी की स्थिति में परिवर्तन क्यों नहीं हुआ? शबरी खुद राम के महल में भोजन क्यों नहीं कर सकती? शबरी और राम के बीच में रामायण काल में जो फासला था, आखिर वह दूरियां क्यों नहीं मिट सकीं? दरअसल राम और शबरी दोनों सनातन संस्कृति के जीवंत आदिम प्रतीक हैं। एक संपन्नता व प्रभुता का है तो दूसरा सुविधाओं से वंचित आखिरी कतार का है। लेकिन दोनों में एक समानता है। दोनों ही एक दूसरे के प्रति भाव से भरे हैं।

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उत्तर प्रदेश के गन्ना मंत्री सुरेश राणा अलीगढ़ जिले के लोहागढ़ में बिना पूर्व सूचना दिए रजनीश कुमार के यहां पहुंच गए। रजनीश के परिवार वाले रिश्तेदारी में गए थे। इसलिए वह देर शाम को बाजार से गोलगप्पे व चाट खा कर सो गया था। उसकी रसोई पहले से ही उदास थी। वह मंत्री, सांसद, विधायक को भोजन कैसे कराता? मेहनतकश रजनीश नींद की खुमारी में था कि रात को 11 बजे उसके दरवाजे की कुंडी जोर-जोर से खटखटाई जाने लगी। दरवाजा खोलते ही वह भौंचक रह गया। सामने मंत्री, सांसद व विधायक थे। उसे तो तत्काल भरोसा ही नहीं हुआ कि इतने बड़े लोग उसके दरवाजे पर आ गए। आरोप है कि मंत्री ने बाहर से ही घर पर खाना मंगवाया। गरीब के घर पालक पनीर, मखानी दाल, छोला, रसगुल्ला, मिनरल वाटर व रायता सजा दिया गया और इन पकवानों की खुशबू से रजनीश का घर सुवासित हो उठा। पंडित दीनदयाल ने राजनीतिक अस्पृश्यता को महापाप कहा था। सवाल यह है कि क्या इन बेशऊर सियासी करतबों से सामाजिक व राजनीतिक अस्पृश्यता का निर्मूलन संभव है? फिराक गोरखपुरी सम्मान से अलंकृत कवि स्वप्निल श्रीवास्तव ने कहा, ‘यह एक किस्म का दलित टूरिज्म है। भाजपा ही नहीं, कांग्रेस भी इस काम में बहुत निपुण थी। गांधी परिवार तो कुछ वर्ष पहले तक दलितों के यहां भोजन करने, रुकने आदि को लेकर अक्सर चर्चा में रहता था। साथ भोजन करने से पिछड़ों और दलितों की स्थिति में सुधार नहीं आएगा। उनके प्रति संवेदनशील होने से ही सामाजिक व आर्थिक बदलाव संभव है लेकिन सियासत में संवेदनशीलता तकरीबन अनुपस्थित हो चुकी है।’

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