न्यूज फ्लैश

बड़े चिदंबरम तक पहुंचती ‘जांच की आंच’

सुनील वर्मा

30 अक्टूबर 2012 को पुद्दुचेरी पुलिस ने एक छोटे से उद्योगपति रवि श्रीनिवासन को तत्‍कालीन वित्तमंत्री पी. चिदंबरम के पुत्र कार्ति चिदंबरम की शिकायत पर गिरफ्तार किया था। दरअसल उन्‍होंने ट्विटर पर कार्ति चिदंबरम के खिलाफ भ्रष्‍टाचार में लिप्‍त होने की टिप्पणी कर दी थी। चिदंबरम के बेटे की शिकायत पर पुलिस ने जिस चुस्‍ती के साथ कार्रवाई की थी, अगर देश की सर्वोच्‍च जांच एजेंसी सीबीआई और प्रर्वतन निदेशालय भी कार्ति चिदंबरम के खिलाफ ऐसी ही त्‍वरित कार्रवाई कर देता तो शायद कार्ति चिंदबरम एक साल पहले ही भ्रष्‍टाचार के आरोप में गिरफ्तार हो जाते। लेकिन सीबीआई और ईडी देर आए, दुरुस्‍त आए और एक साल बाद ठोस सबूत और गवाह मिलने के बाद कांग्रेस में दूसरे नंबर की हैसियत रखने वाले चिदंबरम के बेटे कार्ति को गिरफ्तार कर ही लिया।
कार्ति पर आरोप हैं कि उन्होंने रिश्वत लेकर आईएनएक्‍स मीडिया कंपनी को भारी विदेशी निवेश हासिल करने में मदद की। इसके लिए उन्‍होंने अपने पिता की सरकारी हैसियत का इस्तेमाल किया। अब जबकि पी. चिदंबरम के पुत्र कार्ति कानूनी शिकंजे में आ गए हैं तो सवाल उठता है कि क्‍या ये मामला यहीं खत्‍म हो गया है। लेकिन ऐसा नहीं है। मामले की जांच से जुड़े सीबीआई के एक वरिष्‍ठ अधिकारी कहते हैं, ‘मामला यहीं तक सीमित नहीं है। इस मामले की जांच के तार धीरे-धीरे पी. चिदंबरम से जुड़ रहे हैं। क्योंकि लाभ भले ही उनके पुत्र ने उठाया, लेकिन कार्ति को लाभ उठाने लायक का इशारा उनके पिता पी. चिदंबरम की सहमति से ही मिला था। इसके लिए कथित तौर पर उन्होंने मंत्री पद के अधिकारों का अनुचित रूप से इस्तेमाल किया था। जांच एजेंसी को ऐसे कई दस्‍तावेज हासिल हो चुके हैं।’
हालांकि कांग्रेस कार्ति चिदंबरम की गिरफ्तारी को राजनीतिक साजिश करार दे चुकी है। लेकिन चिदंबरम को अपने बेटे की गिरफ्तारी का आभास पहले ही हो चुका था। इसलिए उन्‍होंने एक महीने पहले ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर सीबीआई और ईडी पर राजनीतिक दबाव में उनके परिवार को परेशान करते हुए गिरफ्तारी की आशंका जताई थी।

क्‍या है पूरा घोटाला
सीबीआई ने 15 मई 2017 की रात पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम के बेटे कार्ति चिदंबरम और उनकी कंपनी चेस मैनेजमेंट सर्विस, उनकी रिश्तेदार पद्मा विश्वनाथन और उनकी कंपनी एडवांटेज स्ट्रेटजिक कंसल्टिंग समेत आईएनएक्स मीडिया (अब 9एक्स मीडिया) के निदेशकों पीटर मुखर्जी और इंद्राणी मुखर्जी और वित्त मंत्रालय के कुछ अज्ञात अधिकारियों पर आईएनएक्स मीडिया प्राइवेट लिमिटेड में एफडीआई के लिए आपराधिक साजिश रचने, धोखाधड़ी करने, भ्रष्ट तरीके अपनाने, सरकारी कर्मचारियों पर दबाव डालने की धाराओं में दो एफआईआर दर्ज कर छापेमारी की थी। तलाशी के दौरान जांच एजेंसी को दस्तावेज, कंप्यूटर और लैपटॉप की हार्ड डिस्क से धोखाधड़ी से जुड़े अहम दस्‍तावेज मिले थे। सीबीआई की एफआईआर में कहा गया है कि आईएनएक्स मीडिया कंपनी 2006 में बनी थी और इस कंपनी के कर्ताधर्ता पीटर मुखर्जी और इंद्राणी मुखर्जी थे। ये दोनों फिलहाल अपनी बेटी शीना बोरा की हत्या के आरोप में जेल में बंद हैं। आरोप है कि आईएनएक्स मीडिया ने 13 मार्च, 2007 को फॉरेन इन्वेस्टमेंट प्रमोशन बोर्ड यानी एफआईपीबी से तीन विदेशी कंपनियों को दस रुपये के 14,98,995 इक्विटी शेयर और दस रुपये के 31,22,605 कन्वर्टेबल, नॉन-कम्यूलेटिव रिडेमेबल प्रिफरेंस शेयर जारी करने की इजाजत मांगी थी। यह आईएनएक्स की ओर से जारी किए गए कुल इक्विटी शेयर का 46.21 फीसदी था। मॉरीशस के जिन विदेशी निवेशकों को शेयर जारी करने की इजाजत मांगी गई थी वे थे डनअर्न इन्वेस्टमेंट लिमिटेड, एनएसआर पीई मॉरीशस और न्यू वरनॉन प्राइवेट इक्विटी लिमिटेड। एफआईपीबी ने साफ कहा था कि दस रुपये अंकित मूल्य के 4.62 करोड़ रुपये के प्रस्तावित शेयरों को विदेशी निवेश के तौर पर अनुमति मिल सकती है। लेकिन आईएनएक्स न्यूज में होने वाले निवेश के लिए एफआईपीबी से अलग से अनुमति लेनी होगी। बोर्ड ने वित्त मंत्री के पास आईएनएक्स मीडिया में विदेशी निवेश को मंजूरी की सिफारिश भेजी थी आईएनएक्स न्यूज में नहीं। एफआईआर में कहा गया है कि तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने बोर्ड की इन सिफारिशों को मंजूरी दे दी। लेकिन कंपनी ने इन सिफारिशों का उल्लंघन करते हुए आईएनएक्स न्यूज में 26 फीसदी पूंजी (जिसमें विदेशी निवेश भी शामिल था) का निवेश कर दिया और आईएनएक्स मीडिया में 305 करोड़ रुपये का विदेशी निवेश करवाया। जबकि इजाजत सिर्फ 4.62 करोड़ रुपये की थी। यह सब इसलिए हो पाया कि दस रुपये के शेयर विदेशी निवेशकों को 800 रुपये के प्रीमियर पर बेचे गए जिसकी मंजूरी ही नहीं ली गई थी। लेकिन दस रुपये के शेयर 800 रुपये में बेचने की आईएनएक्स मीडिया की चालबाजी आयकर विभाग की पकड़ में आई तो वित्त मंत्रालय से जवाब मांगा गया। इस मुसीबत से बचने के लिए ही कंपनी ने पी. चिदंबरम के बेटे कार्ति चिदंबरम से मदद ली थी।
कार्ति चिदंबरम की सलाह पर ही आईएनएक्स मीडिया ने वित्त मंत्रालय को जवाब दिया कि उसने सब कुछ ठीक किया है। कार्ति के प्रभाव में एफआईपीबी ने कंपनी के घोटाले को नजरअंदाज तो किया ही, साथ ही कंपनी से कहा कि वो मंजूरी के लिए एक नया आवेदन दे जिसे बोर्ड ने मंजूरी दे दी। एफआईपीबी में भारत सरकार के पांच सचिव शामिल होते हैं। जाहिर है कि मंजूरी देने में न सिर्फ पूर्व वित्‍तमंत्री चिदंबरम ने बल्कि एफआईपीबी बोर्ड के पांचो सदस्‍यों ने भी अपने पद का दुरुपयोग किया। सीबीआई प्रवक्‍ता अभिषेक दयाल कहते हैं, ‘अभी मुख्‍य आरोपी से पूछताछ और जांच चल रही है और अन्‍य संदिग्धों की भूमिका सामने आने पर गिरफ्तारी संभव है।’

छोटे चिदंबरम ने ऐसे खाई घूस
आईएनएक्स मीडिया मामले की जांच से जुड़े एक अधिकारी बताते हैं, ‘आईएनएक्‍स को लाभ पहुंचाने की एवज में 22 सितंबर, 2008 को कार्ति चिदंबरम की कंपनी को 35 लाख रुपये दिए गए थे। इसके बाद उनकी रिश्तेदार पद्मा विश्वनाथन की कंपनी एडवांटेज स्ट्रेटजिक कंसल्टिंग व उससे जुड़ी कंपनियों को लंदन की एक कंपनी आर्टेविया डिजिटल यूके लिमिटेड से 60 लाख के शेयर ट्रांसफर किए गए। सीबीआई ने इस लेन-देन के सबूत जुटा लिए हैं।’
यहां यह बताना जरूरी है कि आईएनएक्‍स कंपनी के निदेशक इंद्राणी और पीटर मुखर्जी अपनी बेटी शीना बोरा की हत्या के आरोप में 2015 से जेल में बंद हैं। इस हत्याकांड की जांच भी सीबीआई कर रही है। सीबीआई इस हत्याकांड में इंद्राणी और पीटर के वित्तीय लेन-देन की जांच कर रही थी। उसी दौरान पीटर मुखर्जी की कंपनी से कार्ति चिदंबरम की कंपनी को हुए लेन-देन का उल्लेख देखकर जांच एजेंसी का माथा ठनका था। इसी के बाद से सीबीआई लगातार आईएनएक्स ग्रुप के सभी तरह के लेन-देन और दस्तावेजों की छानबीन की। धीरे-धीरे आईएनएक्स और कार्ति के संबंध स्थापित होते चले गए। उसके बाद सीबीआई कार्ति चिंदबरम से जुड़ी कंपनियों के बीच लेन-देन का पता लगाने में जुटी थी। छोटे चिदंबरम के खिलाफ चल रही जांच में ईडी और आयकर विभाग भी सीबीआई का सहयोग करने लगे। हालांकि एफआईआर में पी. चिदंबरम का नाम नहीं है लेकिन धीरे-धीरे उनकी भूमिका सामने आ रही है।

बड़े चिदंबरम के खिलाफ सबूत
पी. चिदम्बरम के खिलाफ जांच एजेंसी के पास पुख्ता सबूत हैं। इसलिए हो सकता है देर सबेर वे भी जांच एजेंसी की गिरफ्त में हों। फिलहाल जल्‍द ही उनसे पूछताछ होगी ये सीबीआई ने साफ कर दिया है। क्‍योंकि मुंबई की जेल में बंद इन्द्राणी मुखर्जी से जब सीबीआई गिरफ्त में फंसे कार्ति चिदम्बरम ने ही पी. चिदम्बरम से 2007 में उनके दफ्तर में मुलाकात कराई थी। पूर्व वित्‍तमंत्री के मदद का भरोसा देने पर ही उन्‍होंने कार्ति चिदम्बरम को एक करोड़ रुपये दिए थे। इन्द्राणी मुखर्जी के बयान को सीबीआई ने मजिस्‍ट्रेट के सामने कलमबंद करा दिया है जो पिता-पुत्र के गले का फंदा बनेगा। चिदंबरम की बड़ी मुश्‍किल वो सबूत है जो चिदंबरम के चार्टर्ड अकाउटेंट भास्‍करण ने जांच एजेंसी को सौंपे हैं। भास्कर रमन को कार्ति की गिरफ्तारी से एक महीना पहले ईडी ने गिरफ्तार किया था।
ईडी का दावा है कि सीए भास्कर रमन ने कार्ति द्वारा कमाई गई भारी अवैध संपत्ति को भारत व विदेशों में ठिकाने लगाने में मदद की थी। इसी आधार पर अब ईडी भी कार्ति को कभी भी गिरफ्तार कर सकती है, उसके बाद संभवत: पी. चिदंबरम से भी पूछताछ संभव है। फिलहाल सीबीआई की परेशानी का सबब ये है कि तीन बार रिमांड लेने के बाद भी कार्ति चिदंबरम ने जांच एजेंसी को कोई सहयोग नहीं दिया है। जांच टीम के एक अधिकारी की मानें तो आरोप की आंच पी. चिदंबरम तक न पहुंचे इसलिए कार्ति ने एजेंसी को सहयोग नहीं किया। लेकिन पूरी जांच में ये बात स्‍थापित हो चुकी है कि आईएनएक्स मीडिया में गैरकानूनी तरीके से विदेशी निवेश की मंजूरी पी. चिदंबरम के वित्तमंत्री रहते हुए उनकी सहमति से मिली थी। लिहाजा चिंदबरम देर सबेर इस घोटाले की आंच में झुलसे बिना नहीं रहेंगे।

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