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जिन्दगी हाशिये पर- अटैची भर जीवन, मुंबई में आधी सदी

यकीन न होगा किसी को कि कैसे कोई मुंबई जैसे शहर में 50 साल रह लेता है सिर्फ एक अटैची में दो-चार कपडे लेकर-बिना किसी नौकरी और घर के!

सत्यदेव त्रिपाठी
मुझे भी यकीन न होता, यदि मैंने देखा न होता… यूं अपने देश में यदि ऐसा हो सकता है, तो मुम्बई में ही या कदाचित चेन्नई, कोलकाता व दिल्ली में, वरना हमारे देश के गांवों में तो अकल्पनीय ही है यह। वहां ऐसा जीवन बन पाने का सवाल ही नहीं उठता… और बनारस जैसे मंझोले एवं जौनपुर-बलिया जैसे छोटे शहरों में यह बन तो सकता है, बने रह नहीं सकता। साल-माल में लोग बसा ही देंगे। बहरहाल, सुरेश झा नामक ऐसे अजूबे शख़्स को मैंने जाना 2002 के बाद ही, जब मुम्बई में मासिक गोष्ठियों की ‘बतरस’ चलाने लगा और उसमें वे आने लगे। 60 फीसदी बाल पके, थोडेÞ तेल लगाके पीछे को फिराये गये, पर आगे आ आने को आतुर। ऊबड़-खाबड़ मुखड़े को सधा-सुता हुआ बनाने की जहिराती असफल कोशिश। भावहीन चेहरे में जड़ी निरपेक्ष-सी मुचमुचाती आंखों पर रखा नामाकूल-सा चश्मा। पूरी बांह की बदरंग कमीज को लूर-बाउर पैण्ट में ‘इन’ करके पहने और हाथ में अटैची संभालते तथा रबर के जूते में एक पांव से लंगड़ाते चलती एक लम्बी-सी आकृति ध्यान खींचती तो न थी, लेकिन दिख जाने के बाद ध्यान में टिक जाती थी। फिर कभी सुनने में आया कि उभरती जवानी में सुरेश झा टीपटॉप से रहते भी थे और फबते भी थे।
हमारे मिलने की वजह बड़ी सहज रही। ‘बतरस’ का आप्त वाक्य था- ‘बतरस’ में मान सदा हाजिरी से है’ और हाजिर हो जाना सुरेश झा की नियति थी। वे अखबारों में ‘आज के कार्यक्रम’ पढ़ लेते और बेहतर खाना मिलने के योग्यताक्रम (मेरिट) के अनुसार की जगहों पर पहुंच जाते। ऐसे में सिर्फ नाश्ता-चाय मुहय्या कराने वाली ‘बतरस’ का नम्बर हर बार तो लगना सम्भव ही न था, पर साल में 3-4 बार तो वह सुरेश झा की उपस्थिति से उपकृत हो ही जाती थी। हां, योग्यता-क्रम के अनुसार ही रात्रि-भोज के चलते ‘बतरस’ के सालाना जलसों में उनकी उपस्थिति का भाव लगभग स्थायी था।
इस तरह सुरेश झा के खाने का मामला टनाटन था, क्योंकि मुम्बई जैसे विराटनगर में रोज ही ऐसे ढेरों आयोजन होते रहते हैं। उनके बडेÞ पुराने मित्र विनोद चौमाल तो बताते हैं कि जैन समुदाय के आयोजनों में सुरेशजी रात को देर से जाते और सभी के खा लेने के बाद भोजन बचते देखकर थैले में ले भी लेते, जो दूसरे दिन खाते। और उनके ऐसे कुछ धनी-धरिकार यजमान भी बन गये थे, जो कभी इत्तफाक से आयोजन… आदि न होने पर मनुष्यता वश या स्वर्गादि के पुण्य-लाभ के लोभ में उन्हें खिलाते भी थे और कभी-कभार मदद स्वरूप कुछ दक्षिणा भी दे देते थे, जो उनके जेब-खर्च के काम आती था।
उनका स्थायी निवास कालबादेवी का सघन आबादी वाला बाजार का क्षेत्र था, जहां अपने गांव के पास के विवेकी इत्रवाले के बाकड़े या फिर दूसरे बाकड़ों पर भी रातों को सो लेते थे। वही अटैची सुरेशजी का सिरहाना बनती, जिसमें ब्रश-तौलिया आदि के साथ दो-चार कपड़े और कविता की डायरी-नोटबुक भी होती। यह अटैची उनकी पहचान बन गयी थी, क्योंकि दिन में वे कहीं भी जायें, हाथ में टंगी अटैची उनके साथ होती। खाने-सोने की इस व्यवस्था के साथ सुलभ शौचालय और रेलवे स्टेशन आदि के स्नानागार नहाने-कपड़े धोने के लिए सहज ही सुलभ होते। सोने के ठीहे के आसपास का अशोक भेलवाला सुरेशजी को कितनी भी भेल मुफ्त खिलाने का अनकहा कौल कर चुका था। चाय के आदती सुरेश को चाय पिलाने वाले तो बहुतेरे थे। कई बार बीमारियों के शिकार हुए- डेंगू जैसे मर्ज हुए। पांव टूटा, सरिया लगा… पर गौरीदत्त मित्तल मेडिकल संस्थान में कार्यरत सुधीर झा जैसे जातीय अपनों ने और जे.जे. अस्पताल में कुछ परिचितों-मित्रों ने दाखिल कराके इलाज भी करा दिया। इन्हीं सबके बल रेकॉर्ड है कि पूरी मुम्बई में सुरेश झा ने किसी से कभी पांच रुपये भी उधार नहीं मांगे।
इन्हीं सबके सहारे सुरेशजी कायम रह सके अपने जीवन के उस सुचिंतित फलसफे पर, जिसका जिक्र महानगर के कवि रमेश श्रीवास्तव ने किया- ‘चौबीस घंटे में कुल आधे घण्टे खाने के लिए बारह घंटे काम करना तो बेवकूफी है’। अपनी इसी मान्यता के चलते ग्रेजुएट सुरेश झा ने मारवाड़ी कॉमर्शियल स्कूल की नौकरी भी साल-माल में ही यह कहकर छोड़ दी कि आठ घंटे पढ़ाओ, कांपियां जांचो, फिर ऊपर से प्रिंसिपल व प्रबन्धक आदि की धौंस भी सहो… ‘इसके लिए नहीं बना हूं मैं’।
फिर काहे के लिए बने थे वे, का उत्तर यूं कि कविता व फिल्मों में गीत लिखने के लिए झांसी में मां-पिता और तीन छोटे भाइयों को छोड़कर मुम्बई भाग आये थे। कुछेक संगीतकारों के अलावा अपने अंचल के गीतकार इन्दीवर के कुछ अच्छे सम्पर्क में रहे थे और आशा भोसले तक से उनके मिलने की पक्की खबर है शहर को, किंतु कहीं बात बनी नहीं। मुरलीधर नामक किसी छोटे-मोटे संगीतकार ने कुछ गीत रेकॉर्ड भी किये थे, पर वे निजी अलबम चले बिल्कुल नहीं। कुल मिलाकर ठिकाना मिला पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाले उन कवि-सम्मेलनों में, जहां ‘अहो रूपं अहो ध्वनि:’ की आत्ममुग्धता में दुनिया से उपेक्षित कविगणों की पीढ़ियां गुजर जाती हैं। वहां कभी सुरेशजी ने संचालन वगैरह भी किया, पर धीरे-धीरे वहां भी उनकी स्थिति लतमरुआ पहलवान की ही होके रह गयी, क्योंकि उनमें भी निठल्ले सिर्फ सुरेशजी रहे- बाकियों के अपने रोजगार व नौकरियां रहीं। इन्हीं कवि मित्रों के कहे मुताबिक सुरेशजी को कविता (के छन्द) की समझ न थी, इसलिए कविताई में कुछ कर न सके। और कुछ किये बिना क्या मुंह लेके घर रहने जायें, की शर्म के मारे यहीं रह गये।
अगली सुबह कुछ अच्छा हो जायेगा, की उम्मीद तो झा साहेब की जाने कब की छूट गयी थी… और जब से मेरा कुछ साबका उनसे पड़ा, मैंने पाया कि वे अपनी दशा के लिए दुनिया को जिम्मेदार मानते थे और यह कहते हुए सरकश भी हो उठते थे। आत्मग्लानि से बचने का यही उनका मनोविज्ञान था शायद। और कुछ किये बिना जी-खा लेने की लम्बी लत ने उन्हें परजीवी बना दिया था। इसका पुख़्ता प्रमाण तब मिला, जब किसी लेखक के लावारिस मर जाने पर हमने एक ‘बतरस’ रखी- ‘लावारिस साहित्यकार’। उन्हें सादर बुलाया और प्रमुख वक्तव्य की तरह ‘आपबीती’ पर उनके विचार सुनने चाहे, तो वे आये नहीं। मिलने पर पूछा, तो शर्मिन्दगी भरी चुप के अलावा जवाब न था।
दो साल हुए, वे मुम्बई छोड़कर चले गये और पता लगा है कि बदायूं में अपने भाई के साथ रह रहे हैं, पर किसी दोस्त के पास एक चिट्ठी आयी है कि मुम्बई जैसा आराम वहां नहीं है। फिर आना चाहते हैं- मुम्बई जिन्दाबाद…!

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