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सीबीआई की चुनरी पर दाग लगाता मांस कारोबारी

Meat exporter Moin Qureshi is taken by ED officials to the patiala house court in New Delhi after his arrest on saturday. the court reserved its order on EDs demand application, seeking 14 days custody. Express Photo by Amit Mehra New Delhi 260817

मांस का निर्यात करने वाले एक कारोबारी की संदेहास्पद कारगुजारियों की जांच की प्रक्रिया में देश की प्रतिष्ठित स्वतंत्र जांच एजेंसी केंद्रीय जांच ब्यूरो के एक नहीं- दो नहीं- बल्कि तीन निदेशकों को संदेह के घेरे में खड़ा करने वाली एक अनोखी और विचित्र घटना है। निश्चित ही गिनीज बुक आॅफ वर्ल्ड रिकार्ड्स में नहीं तो कम से कम लिम्का बुक्स आॅफ रिकार्ड में इसे शामिल किया जाना चाहिए। केंद्रीय जांच ब्यूरो की कार्यशैली लंबे समय से विवादों का केंद्र रही है। देश के प्रमुख मांस निर्यातक मोइन कुरैशी के खिलाफ कर अपवंचना की जांच के दौरान मिली जानकारी के आधार पर आयकर विभाग ने ए पी सिंह और पत्नी को नोटिस जारी किए थे। हालांकि इस घटना के बाद ए पी सिंह ने संघ लोक सेवा आयोग के सदस्य पद से इस्तीफा दे दिया था, परंतु बाद में प्रवर्तन निदेशालय और केंद्रीय जांच ब्यूरो ने मोइन कुरैशी से जुड़े प्रकरण में उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले दर्ज किए।

ए पी सिंह के उत्तराधिकारी बने जांच ब्यूरो के निदेशक रंजीत सिन्हा के निवास के आगंतुक रजिस्टर में भी मोइन कुरैशी के नाम की कई प्रविष्ठियां थीं और इस वजह से वह भी कानूनी कार्यवाही का सामना कर रहे हैं। अभी यह विवाद थमा भी नहीं था कि अब अचानक जांच ब्यूरो के मौजूदा निदेशक आलोक कुमार वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना इसी मोइन कुरैशी के माध्यम से दो से तीन करोड़ रुपये की रिश्वत लेने के आरोपों की चपेट में आ गए हैं। सोहराबुद्दीन शेख और तुलसीराम प्रजापति फर्जी मुठभेड़ मामलों में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के खिलाफ कार्रवाई किए जाने के वक्त ए पी सिंह ही जांच ब्यूरो के निदेशक थे और नवंबर, 2012 में पद से सेवानिवृत्त होने के तुरंत बाद ही उन्हें संघ लोक सेवा आयोग का सदस्य नियुक्त कर दिया गया था।

जांच ब्यूरो के वरिष्ठ अधिकारियों में संवेदनशील मामलों को लेकर होने वाली खींचतान की परिणति सर्वाेच्च न्यायालय के उस निर्देश से हुई जिसमें जांच ब्यूरो के निदेशक रंजीत सिन्हा को अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में 2जी स्पेक्ट्रम मामले की जांच से अलग रहने को कहा गया। पूर्व निदेशक रंजीत सिन्हा पर आरोप था कि 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन और कोयला खदान आवंटन के आरोपियों के नाम उनके निवास पर रखे मुलाकातियों के आगंतुक रजिस्टर में हैं। सवाल यह है कि जांच ब्यूरो के निदेशक इन आरोपियों से अपने घर पर क्यों मुलाकात करते थे?

न्यायालय अब पूर्व सीबीआई निदेशक सिन्हा के निवास से मिले आगंतुक रजिस्टर में तमाम आरोपियों की प्रविष्ठियों के मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल गठित करने पर विचार कर रहा है।
सिंह के उत्तराधिकारी बने जांच ब्यूरो के निदेशक रंजीत सिन्हा के निवास के आगंतुक रजिस्टर में भी मोइन कुरैशी के नाम की कई प्रविष्ठियां थीं। रंजीत सिन्हा द्वारा 2012 में जांच ब्यूरो के निदेशक का पद ग्रहण करने के बाद मोइन कुरैशी से 15 महीने के दौरान उनकी करीब 90 मुलाकातें हुई थीं।

ये तथ्य उजागर होने के बाद नवंबर, 2014 में न्यायालय ने पहले रंजीत सिन्हा को 2जी मामले की जांच से दूर रहने का निर्देश दिया और बाद में न्यायालय ने पूर्व निदेशक के खिलाफ भी जांच का आदेश दिया था। यही नहीं, न्यायालय ने 23 जनवरी, 2017 को 2जी स्पेक्ट्रम और कोयला खदान आवंटन मामलों की जांच में अपने पद का दुरुपयोग करने के मामले में जांच ब्यूरो के पूर्व निदेशक रंजीत सिन्हा की भूमिका की जांच करने का आदेश केंद्रीय जांच ब्यूरो के वर्तमान निदेशक आलोक कुमार वर्मा को दिया था। न्यायालय पहली नजर में वह इस बात से संतुष्ट था कि रंजीत सिन्हा ने अपने पद का दुरुपयोग किया था। जांच ब्यूरो के पूर्व निदेशक रंजीत सिन्हा के मामले में शिथिल तरीके से जांच करने के कारण शीर्ष अदालत ने इस साल जनवरी में जांच ब्यूरो को आड़े हाथ भी लिया था। मोइन कुरैशी के खिलाफ लंबित मामलों में प्रगति तो बाद की बात है लेकिन फिलहाल यह प्रकरण जांच ब्यूरो के तीन निदेशकों को अपनी चपेट में ले चुका है।

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