साफ होगा पीके का पत्ता

सरोज सिंह
Sat, 16 Mar, 2019 12:24 PM IST

कहावत है, बड़ा कौर भले खाए, लेकिन बड़ा बोल न बोले. प्रशांत किशोर यही भूल कर गए. एनडीए में शामिल होने का फैसला जदयू द्वारा सर्वसम्मति से लिया गया था, जिस पर सवाल उठाने का कोई तुक बनता, लेकिन पीकेजोश में होश खो बैठे. खुद में प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री बनाने की कुव्वत देखना प्रशांत को अब भारी पडऩे वाला है. जदयू से किसी भी वक्त उनकी विदाई तय है.

राजनीति के आसमान में कब कौन सितारा चमकेगा और कौन ओझल होगा, इस बारे में तो अनुमान लगाना बेहद कठिन है, लेकिन सितारे की चाल-ढाल और व्यवहार से उसके चमकने या फिर ओझल होने की झलक जरूर मिलने लगती है. चुनावी रणनीतिकार से मुख्य धारा की राजनीति में आए प्रशांत किशोर को लेकर बिहार के सियासी गलियारों में इन दिनों ऐसी ही झलक देखने को मिल रही है. पीके के नाम से मशहूर प्रशांत किशोर के सितारे फिलहाल गर्दिश में दिखाई पड़ रहे हैं. एक वक्त था, जब लालू प्रसाद और नीतीश कुमार के बीच दोस्ती और उसके बाद चुनावी फतह के चाणक्य बनकर प्रशांत किशोर उभरे थे. पीके के चमकने का सिलसिला जारी रहा और बाद के दिनों में नीतीश कुमार ने उन्हें अपनी पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तक बना दिया. लेकिन, हालिया घटनाक्रम बताते हैं कि बस यहीं से पीके नामक सितारा ओझल होने के रास्ते पर आगे बढ़ गया. हालात ऐसे बन गए हैं कि किसी भी दिन जदयू से पीके का पत्ता साफ हो सकता है या फिर वह खुद किसी नए रास्ते पर चल निकलें.

नीतीश का रहस्योद्घाटन

अति आत्मविश्वास और अति महत्वाकांक्षा से लबरेज पीके के बयानों ने उनकी पार्टी के कई नेताओं को अशांत कर दिया है. प्रशांत किशोर से अशांत कुछ नेता तो खुलकर भड़ास निकाल रहे हैं, तो कुछ अंदरखाने ही बड़े तूफान के आने का इंतजार कर रहे हैं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बाहैसियत राष्ट्रीय अध्यक्ष, प्रशांत किशोर को पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तो बनाया था, लेकिन एक रहस्योद्घाटन करके यह खलबली मचा दी थी कि पीके को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाने में अमित शाह की भूमिका थी. एक निजी चैनल के कॉन्क्लेव में नीतीश ने यह कहकर सनसनी फैला दी कि अमित शाह ने दो बार उन्हें फोन करके पीके को पार्टी में पद देने के लिए कहा था. कहने को यह बात साधारण तौर पर कही गई थी, लेकिन इसके पीछे दल के अंदर की वह लंबी खींचतान थी, जिसका पटाक्षेप उस दिन मुख्यमंत्री ने किया था. जदयू के अंदर कई व्याकुल आत्माएं ललन सिंह और आरसीपी सिंह की काट के मौकों की तलाश में रहती हैं और ऐसी आत्माओं को पीके के रूप में एक मौका हाथ लगा था. खुद पीके राज्यसभा सांसद आरसीपी सिंह और ललन सिंह से ऊपर दिखने और जताने के लिए बेचैन रहते हैं. दरअसल, प्रशांत किशोर जब पार्टी में आए थे, तो मुख्यमंत्री आवास से सारी चीजें ऑपरेट कर रहे थे. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को यह कतई अच्छा नहीं लग रहा था कि छोटी-छोटी चीजों के लिए मुख्यमंत्री आवास से अधिकारियों को फोन जाएं. ऐसे नेता एक सटीक वक्त का इंतजार कर रहे थे. पटना विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव ने पार्टी के नेताओं को वह मौका दे दिया.

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गौरतलब है कि पटना विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में जदयू ने पूरी ताकत लगा दी थी. मीडिया के एक हिस्से में प्रशांत किशोर को उस जीत का शिल्पकार बताया गया, लेकिन हकीकत यह थी कि उस चुनाव में जदयू के राष्ट्रीय संगठन महासचिव आरसीपी सिंह, जल संसाधन मंत्री ललन सिंह, पूर्व मंत्री श्याम रजक एवं विधान पार्षद नीरज कुमार ने बहुत बड़ी और महती भूमिका निभाई थी. फ्रं टलाइन वाले नरेंद्र सिंह पहले से नीतीश कुमार, ललन सिंह एवं नीरज कुमार के करीबी थे. उनके बेटे को उम्मीदवार बनाने का सुझाव ललन सिंह और नीरज कुमार ने ही दिया था. नीरज ने ही 2015 के विधानसभा चुनाव के वक्त नरेंद्र सिंह से नीतीश को मिलवाया था. पटना विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव के वक्त भी नरेंद्र सिंह के बेटे मोहित प्रकाश को नीरज ने ही प्रशांत किशोर से मिलवाया था. पटना विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में जीत भले ही जदयू प्रत्याशी को मिली, लेकिन पार्टी की भद्द भी बुरी तरह पिटी. उस जीत के बाद यह संदेश गया कि मुख्यमंत्री आवास और सचिवालय खुद इस चुनाव में हस्तक्षेप कर रहा था. विरोधियों के साथ-साथ पार्टी नेताओं में भी इस बात की चिंता थी. आरसीपी सिंह और ललन सिंह ने मुख्यमंत्री को यह जानकारी दी थी.

यूं शुरू हुआ परकतरना

नीतीश को पहले तो भरोसा नहीं हुआ, लेकिन जब कुछ अधिकारियों से पूछताछ हुई, तो पता चला कि वाकई मुख्यमंत्री आवास से ही सारा खेल किया गया और वहीं से अधिकारियों को फोन जा रहे थे. इसके बाद आनन-फानन में पीके के परकतरने का अभियान शुरू हुआ. पीके को सीएम हाउस से हटाकर दूसरी जगह पर शिफ्ट करने की रणनीति बनी. रणनीतिकारों की नजर जल संसाधन मंत्री ललन सिंह के पोलो रोड स्थित सरकारी आवास पर जा टिकी. ललन सिंह के सरकारी आवास पर एक कार्यालय बनाया गया. पीके उन दिनों हैदराबाद और दिल्ली की यात्रा पर थे. पटना आने के बाद विधान पार्षद संजय गांधी ने उन्हें सीएम हाउस के बजाय ललन सिंह के सरकारी आवास पर बने कार्यालय से अपनी गतिविधियां चलाने का संदेश सुना दिया. संदेश बिहार के राजाका था, इसलिए पीके कुछ बोल नहीं पाए, क्योंकि संजय नीतीश कुमार के खासमखास माने जाते हैं. पीके के लिए एक, अणे मार्ग से निकल कर पोलो रोड चले जाना किसी अपमान से कम नहीं था. आनाकानी करते हुए उन्होंने एग्जीबिशन रोड स्थित एक इमारत में दो तल्ले का कार्यालय बनाया और वहीं से अपनी गतिविधियां चला रहे हैं. सूत्रों की मानें, तो यह महज कार्यालय की बात नहीं थी, बल्कि यह सीधे-सीधे पीके को उनकी सीमा रेखा बताने की कवायद थी कि एक नए और बाहरी व्यक्ति के भरोसे सब कुछ नहीं किया जा सकता.

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इस बीच प्रशांत किशोर की शिवसेना प्रमुख के साथ फोटो वायरल हो गई. जदयू के अंदर पीके की इस मुहिम को भी बहुत गंभीरता से लिया गया. पीके ने नीतीश कुमार को शिवसेना प्रकरण पर अपनी सफाई दी, लेकिन तब तक नुकसान हो चुका था. लोहा गर्म ही था, तभी पीके ने एक विवादित बयान देकर अपने विरोधियों को एक और मौका दे दिया. उन्होंने यूट्यूब चैनल को दिए गए बयान में महागठबंधन तोडक़र एनडीए में शामिल होने के नीतीश के फैसले पर सवाल खड़ा कर दिया. मुखर जदयू प्रवक्ता नीरज कुमार ने खुल्लमखुल्ला कह दिया कि पीके अभी बच्चा हैं और उन्हें सारी चीजों की जानकारी नहीं है. ओपिनियन पोस्टसे नीरज ने कहा कि पीके की बात को नोटिस करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि उनका बयान दल की आधिकारिक लाइन नहीं है और अपनी निजी क्षमता से सुर्खियों में बने रहने के लिए दिया गया उनका बयान पार्टी को स्वीकार्य नहीं है. संगठन महासचिव आरसीपी सिंह ने भी इशारे में ही बहुत कुछ कह दिया. पार्टी कार्यालय में आयोजित एक प्रेस कांफ्रेंस में आरसीपी सिंह ने पीके का नाम तक लेना उचित नहीं समझा. ओपिनियन पोस्टसे बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि महागठबंधन से अलग होकर एनडीए की सरकार बनाने का फैसला जदयू की पंचायत इकाई से लेकर राष्ट्रीय नेतृत्व तक स्वीकार्य है और जो लोग आज सवाल उठा रहे हैं, वे तो फैसले के समय पार्टी में थे भी नहीं. बकौल आरसीपी सिंह, जिस व्यक्ति को फैसले की नजाकत और प्रक्रिया की जानकारी तक न हो, वह अगर सवाल उठाए, तो उस पर क्या टिप्पणी की जाए. ललन सिंह भी पीके की गतिविधियों को लेकर खार खाए रहते हैं.

चौकड़ी ने बिगाड़ा खेल

आरसीपी सिंह और ललन सिंह के बीच कटु संबंध बीते दौर की बात हो चुकी है और आज दोनों के बीच दांत काटी रोटीका संबंध है. श्याम रजक मंत्री भले न बन पाए हों, लेकिन पार्टी के प्रति उनकी निष्ठा पर सवाल नहीं खड़ा किया जा सकता. विधान पार्षद नीरज कुमार तो वैसे भी नीतीश कुमार, आरसीपी सिंह और ललन सिंह के प्रति शत-प्रतिशत जवाबदेह हैं. ललन एवं आरसीपी सिंह शांत-गंभीर स्वभाव के नेता हैं और दोनों नीतीश के भरोसेमंद भी हैं. जाहिर तौर पर नीतीश के लिए यह बिल्कुल असंभव होगा कि वह पीके के लिए ललन और आरसीपी सिंह जैसे नेताओं को नजरअंदाज कर सकें. इसके बाद बारी आई मुजफ्फरपुर के उस बयान की, जिसमें पीके ने शेखी बघारते हुए यहां तक कह डाला कि जब वह मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बना सकते हैं, तो बिहार के युवाओं को एमपी, एमएलए, जिला पार्षद और मुखिया भी जरूर बना सकते हैं. नीरज कुमार के साथ-साथ श्याम रजक ने भी इस बयान के लिए उन्हें आड़े हाथों लिया और कहा कि कोई भी शख्स नेता नीतियों के आधार पर बनता है, लैपटॉप-कंप्यूटर के सहारे कोई नेता नहीं बन सकता. राजनीतिक जानकारों की नजर में प्रशांत किशोर और पार्टी के दूसरे नेताओं के बीच मची रस्साकशी दरअसल संगठन के आंतरिक सत्ता संघर्ष की परिणति है. प्रशांत किशोर सब कुछ अपने अनुसार चलाना चाहते हैं. पार्टी के दूसरे नेता ऐसा होने नहीं देना चाहते और ऐसा हो भी नहीं सकता.

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विश्वस्त सूत्रों के अनुसार, संगठन चलाने, सीट बंटवारे एवं भाजपा से बातचीत का जिम्मा सिर्फ और सिर्फ आरसीपी सिंह के पास था. पीके को चुनाव प्रचार अभियान चलाने की जिम्मेदारी दी गई है. चुनाव प्रचार अभियान में भी सब कुछ उनके हवाले नहीं किया गया है. प्रशांत किशोर को लेकर उन लोगों में उम्मीद की एक किरण जगी है, जो किसी न किसी रूप में नीतीश से चिपके तो रहना चाहते हैं, लेकिन ललन-आरसीपी जैसे दूसरे नेताओं को स्वीकार नहीं कर सकते. ऐसे लोगों की संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकती है, लेकिन उन्होंने भी पीके के रूप में बहुत बड़ी संभावना देख ली है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार फिलहाल सारी चीजें खामोशी से देख तो रहे हैं, लेकिन उन्हें करीब से जानने वाले बताते हैं कि वह खामोश तो ऊपर से दिखते हैं, लेकिन अंदर ही अंदर एक तूफान उनके मन में जरूर चलता रहता है. इस तूफान की गाज एक न एक दिन प्रशांत किशोर पर जरूर गिरेगी. ऐसा इसलिए कि प्रशांत किशोर अपनी जो महत्वाकांक्षा दिखा रहे हैं, वह जदयू में पूरी नहीं हो सकती. जानकार सूत्र बताते हैं कि पीके जितनी तेजी से चलने लगे थे, उतनी तेजी सूबे की राजनीति में अच्छी नहीं मानी जाती. नीतीश कुमार ने अमित शाह वाली बात कहकर पीके को इशारा कर दिया था, लेकिन चुनावी रणनीति बनाने वाले प्रशांत किशोर उस राजनीतिक इशारे को नहीं समझ पाए और गलती पर गलती करते चले गए. प्रशांत किशोर आगे क्या करते हैं या नीतीश कुमार उनका क्या करेंगे, इस पर भले ही लोगों की नजर है, लेकिन नीतीश और जदयू को करीब से जानने वाले बताते हैं कि पीके नामक सितारे को अब ओझल होना है, उसके चमकने का समय खत्म हो गया है.

– साथ में कुमार कृष्ण

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