राजरंग : प्रियंका का हाथ, सेना के साथ

प्रियंका का हाथ, सेना के साथ

कांग्रेस की ओर से हर मंच पर राहुल गांधी की नीतियों का समर्थन करने वाली प्रियंका चतुर्वेदी को अब उन्हीं नीतियों का विरोध करना होगा. कांग्रेस की मुखर आवाज रहीं चतुर्वेदी ने पार्टी से नाता तोडक़र शिवसेना के साथ रिश्ता जोड़ लिया है. जानकारी के मुताबिक, प्रियंका चतुर्वेदी की बात भारतीय जनता पार्टी के साथ चल रही थी. कांग्रेस छोडऩे का फैसला करने से पहले ही वह भाजपा में जाने के लिए बातचीत कर रही थीं, लेकिन वहां मामला बना नहीं. वह चाहती थीं कि भाजपा उन्हें राज्यसभा में भेजने का वादा करे, लेकिन ऐसा नहीं हो सका. इसके बाद प्रशांत किशोर ने उनकी बात शिवसेना से कराई. पीके इन दिनों शिवसेना का चुनाव प्रबंधन देख रहे हैं. दरअसल, प्रियंका चतुर्वेदी को पार्टी छोडऩे के लिए एक बहाना चाहिए था, क्योंकि टिकट मिलने की संभावना खत्म होने के बाद से ही उन्होंने मन बना लिया था. उन्हें यह बहाना मथुरा में उनके साथ अभद्र व्यवहार करने वाले कांग्रेसियों का निलंबन वापस लेने से मिल गया. उन्होंने ‘महिला सम्मान’ को मुद्दा बनाया और इस्तीफा दे दिया. वैसे, कांग्रेस के नेता मान रहे हैं कि साल खत्म होते-होते उनकी घर वापसी भी संभव है, क्योंकि कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रभारी रणदीप सुरजेवाला और दूसरे कई नेताओं ने उनके पार्टी छोडऩे के बावजूद उन पर कोई तीखी टिप्पणी नहीं की.

राहुल-येचुरी की दोस्ती पर विराम

सियासी गलियारों में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी की दोस्ती के काफी चर्चे थे. सीपीएम महासचिव को इसके लिए अपनी पार्टी के कुछ नेताओं का कोपभाजन भी बनना पड़ा. पिछले साल सीपीएम की बैठक के दौरान येचुरी ने ही कांग्रेस के साथ रणनीतिक तालमेल बनाए रखने का प्रस्ताव पेश किया था और उसे पारित भी कराया गया था. उससे पहले कांग्रेस और सीपीएम ने पश्चिम बंगाल में मिलकर चुनाव लड़ा था, जो येचुरी-राहुल की दोस्ती के चलते ही संभव हो सका था. लेकिन, अब ऐसा लग रहा है कि दोनों की दोस्ती पर विराम लग गया है. दरअसल, दोस्ती टूटने का एक बड़ा कारण पश्चिम बंगाल की छह लोकसभा सीटें और केरल के वायनाड से राहुल गांधी का चुनाव लडऩा बताया जा रहा है. येचुरी चाहते थे कि राहुल रायगंज एवं मुर्शिदाबाद की सीट सीपीएम के लिए छोड़ें. इन दोनों सीटों पर सीपीएम ने कांग्रेस को बहुत मामूली अंतर से हराकर जीत हासिल की थी. दूसरी ओर राहुल चाहते थे कि कांग्रेस द्वारा जीती गईं चार सीटों पर सीपीएम अपने उम्मीदवार न उतारे, लेकिन सीपीएम इनमें से दो सीटों पर लडऩे के लिए अड़ी थी. सो, इन छह सीटों के कारण पश्चिम बंगाल का पूरा मामला बिगड़ गया. यही नहीं, राहुल गांधी ने केरल की वायनाड सीट से लडऩे का फैसला कर लिया. ध्यान रहे, वायनाड सीट सीपीआई के कोटे में है.

×