न्यूज फ्लैश

योग करें हम-1 : सुखी मन, निरोगी काया

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस (21 जून) पर विशेष

अजय विद्युत।

पहले हम किसी को पत्र भेजते थे, तो शुरुआत कैसे करते थे- अत्र कुशलम् तत्रास्तु। यानी हम कुशलता से हैं, स्वस्थ और सुखपूर्वक हैं और विश्वास करते हैं कि आप भी इसी प्रकार होंगे। और आज किसी को संदेश भेजते हैं, बात करते हैं तो पूछते हैं- ‘आपकी तबियत तो ठीक चल रही है ना!’ तब हम स्वास्थ्य की बात करते थे, जबकि आज पहले रोग की जानकारी करते हैं। ऐसा कैसे हो गया, कभी ख्याल किया आपने!

हमारे मनीषियों ने, जो अपार ज्ञान और वैज्ञानिक क्षमता सम्पन्न थे, ‘निरोगी काया’ को पहला सुख यूं ही नहीं बताया। यह हम सबका नैसर्गिक अधिकार है क्योंकि यह हमको मिला ही हुआ है। प्रकृति ने रोग मनुष्य को नहीं दिए। आयुष दिया है, मुस्कान दी है, प्रसन्नता दी है, सुख दिए हैं, सुंदर मन दिया है, इतने स्वास्थ्यवर्धक और स्वादिष्ट फल और सब्जियां व अन्य खाद्यान्न दिए हैं। लेकिन आज के आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की पूरी आधारशिला रोगों पर खड़ी है। रोग हैं और उनका निदान है। कृत्रिम रसायन हैं जो उनसे मिलने वाले कष्टों को कुछ समय के लिए दूर करते हैं। मजे की बात यह है कि 90 प्रतिशत से अधिक रोग हमने खुद पैदा किए हैं, वो चाहे हमारी जीवनशैली के कारण हों, खान-पान के कारण हों या फिर हमारे चरित्र और आचरण के कारण।

चरक, सुश्रुत, पतंजलि और ऐसे कई अन्य भारतीय ऋषियों और वैज्ञानिकों ने हमें ऐसे सूत्र दिए जो समूचे विश्व को निरोगी बनाने के लिए पर्याप्त हैं। आज का पश्चिमी सोच आधारित चिकित्सा विज्ञान जहां तक आज सोच भी नहीं सकता है। खयाल रखिएगा कि इक्कीस जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर हम जब किसी पार्क या कार्यक्रम का हिस्सा बनकर योग कर रहे हों तो यह केवल एक दिन का सेलिब्रेशन बनकर न रह जाए… योग प्रतिदिन करना है क्योंकि हमें प्रतिदिन निरोगी काया और प्रसन्न मन के साथ मुस्कुराते हुए जीना है। यह वैसे ही है जैसे रोज साफ रहने के लिए हम स्नान करते हैं।

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर ‘ओपिनियन पोस्ट’ के इस विशेष आयोजन के पीछे उद्देश्य यही है कि संपूर्ण मानवता अपने तन तथा मन के स्वास्थ्य को लेकर सजग हो। यह सजगता ही हमें संपूर्ण आयुष यानी स्वस्थ तन, अच्छा मन और सकारात्मक सोच व प्रगति की ओर अग्रसर करेगी।

योग हमें स्व-भाव में स्थित कर निरोग, स्वस्थ, प्रसन्न और चेतनावान बनाता है। स्वास्थ्य का अर्थ ही यह है कि हम अपने ‘स्व’ अर्थात् स्वभाव में स्थित हो जाएं जो कि हमारा मूल स्वरूप है। और हमारा मूल स्वरूप है प्रसन्नता। इसमें शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक स्वास्थ्य शामिल हैं यानी शरीर, मन और इंद्रियों का एकलय हो जाना। हम जिन बीमारियों से लड़ रहे हैं उनमें कल जो सबसे बड़ी चुनौती मानवता के सामने आने वाली है, वह कैसर, एड्स, टीबी, हृदयाघात, डायबिटीज नहीं बल्कि अवसाद है। यह अवसाद कहां से आया, यह पूरी तौर पर हमारी अपेक्षाओं, बढ़ती इच्छाओं, हमारे कार्य और विश्राम में असंतुलन का परिणाम है। इसमें प्रकृति का कोई योगदान नहीं है। ऋषियों का तो आशीर्वाद है ‘सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:’, लेकिन इस आशीर्वाद को सत्य बनाना हमारे अपने हाथ में है। आइए, रोग की बात ही क्या करनी, हम करते हैं सेहत की बात, मन को पुष्टि देने की बात, भौतिक और आध्यात्मिक जगत में विजेता बनने की बात… और जैसे ही आप इस दिशा में सोचेंगे, सच जानिए कि विजेता बनना भी क्या, आप विजेता बन ही गए समझिए।

The following two tabs change content below.
ओपिनियन पोस्ट

ओपिनियन पोस्ट

ओपिनियन पोस्ट एक राष्ट्रीय पत्रिका है जिसका उद्देश्य सही और सबकी खबर देना है। राजनीति घटनाओं की विश्वसनीय कवरेज हमारी विशेषज्ञता है। हमारी कोशिश लोगों तक पहुंचने और उन्हें खबरें पहुंचाने की है। इसीलिए हमारा प्रयास जमीन से जुड़ी पत्रकारिता करना है। जीवंत और भरोसमंद रिपोर्टिंग हमारी विशेषता है।
ओपिनियन पोस्ट
About ओपिनियन पोस्ट (5258 Articles)
ओपिनियन पोस्ट एक राष्ट्रीय पत्रिका है जिसका उद्देश्य सही और सबकी खबर देना है। राजनीति घटनाओं की विश्वसनीय कवरेज हमारी विशेषज्ञता है। हमारी कोशिश लोगों तक पहुंचने और उन्हें खबरें पहुंचाने की है। इसीलिए हमारा प्रयास जमीन से जुड़ी पत्रकारिता करना है। जीवंत और भरोसमंद रिपोर्टिंग हमारी विशेषता है।

Leave a comment

Your email address will not be published.


*