#मीटू : मुहिम अच्छी पर मकसद…

अनूप भटनागर

कामकाजी महिलाओं के साथ कार्यस्थल पर यौन शोषण की घटनाओं को सार्वजनिक करने के इरादे से शुरू हुए ‘मीटू’ आंदोलन ने भारत में लगभग सभी क्षेत्रों को अपनी चपेट में ले लिया है। इस आंदोलन में महिलाएं बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रही हैं और अपने अपने अनुभव साझा करने के साथ ही देश के तमाम प्रतिष्ठित और महत्वपूर्ण व्यक्तियों की कथित रूप से पर्दे के पीछे की यौनेच्छा से जुड़ी कारगुजारियों को सामने ला रही हैं। यदि हाल ही में फिल्म निर्देशक सुभाष घई के खिलाफ अभिनेत्री केट शर्मा की पुलिस में दर्ज कराई गई शिकायत को छोड़ दें तो अधिकांश महिलाओं ने सालों पहले अपने साथ हुई घटनाओं को नए कलेवर में पेश करने का प्रयास किया है।
यहां एक बात और महत्वपूर्ण है कि भले ही महिलाओं ने कथित यौन उत्पीड़न की घटनाएं होने के कई साल बाद ही इस समस्या को सार्वजनिक करने का साहस दिखाया लेकिन ‘मीटू’ अभियान ने कामकाजी महिलाओं के साथ कार्यस्थल पर होने वाले आचरण के प्रति सुप्त अवस्था में पड़े हमारे समाज को झकझोरने और इन विषयों पर चर्चा करने के लिए बाध्य करने का काम किया है।
तनुश्री दत्ता ने जरूर दस साल पहले भी अपने साथ हुए कथित अशोभनीय व्यवहार के खिलाफ आवाज उठाई थी और एक बार फिर उन्होंने हाल ही में अभिनेता नाना पाटेकर के खिलाफ ओशिवारा थाने में मामला दर्ज कराया है। एक अन्य लेखिका निर्माता विंता नंदा ने अभिनेता आलोक नाथ पर करीब 10 साल पहले उनका बलात्कार करने का आरोप लगाया लेकिन इस मामले के तूल पकड़ने के साथ ही अभिनेता की पत्नी ने उनके खिलाफ मानहानि का नोटिस भेज दिया।
पत्रकारिता के दौर से संबंधित घटनाओं को लेकर ‘मीटू’ की चपेट में आए विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर को इस्तीफा देना पड़ा। दूसरी ओर, भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड की प्रशासकों की समिति ने बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी राहुल जौहरी को ऐसे ही एक मामले में नोटिस थमा दिया है।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि नाना पाटेकर, आलोक नाथ, सुभाष घई, रजत कपूर, साजिद खान, एमजे अकबर, विनोद दुआ और ऐसे ही अनेक चर्चित व्यक्तियों पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाने वाली महिलाएं प्रगतिशील, अपने अधिकारों के प्रति जागरूक, शिक्षित एवं संपन्न हैं, लेकिन कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न रोकने संबंधी उच्चतम न्यायालय की 1997 की व्यवस्था के बावजूद इतने लंबे समय तक उनकी चुप्पी और किसी प्रकार की कानूनी कार्यवाही न करना कई सवालों को जन्म देता है।
पहला सवाल तो इस आंदोलन के समय को लेकर ही उठ रहा है। भारत में सोशल मीडिया पर मीटू आंदोलन का प्रादुर्भाव 2017 में हुआ और पांच राज्यों की विधानसभा और 2019 के लोकसभा चुनाव नजदीक आते आते यह परवान चढ़ने लगा है। कई लोगों को लगता है कि यह आंदोलन किसी न किसी रणनीति का हिस्सा है।
सवाल यह भी उठ रहा है कि यौन उत्पीड़न की शिकार इन महिलाओं की आखिर इतनी लंबी खामोशी की वजह क्या थी? तनुश्री दत्ता की तरह ही उन्होंने भी यौन उत्पीड़न करने वाले सहयोगियों या दूसरे व्यक्तियों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करने की पहल क्यों नहीं की? कार्य स्थल पर यौन शोषण के आरोप लगाने वाली इन कामकाजी महिलाओं का अपने अधिकारों के प्रति भलीभांति जागरूक होने और इस तरह की अपमानजनक घटनाओं को अंतिम नतीजे तक पहुंचाने में सक्षम होने के बावजूद लंबे समय तक खामोश रहना भी कई सवालों का जन्म देता है।
कामकाजी महिलाओं को अक्सर कार्यस्थल पर कई बार असहज स्थिति का सामना करना पड़ता है। लेकिन इन असहज परिस्थितियों में यह अंतर करना शायद कठिन होगा कि कौन सी स्थिति यौन शोषण की है और कौन सी स्थिति मानसिक उत्पीड़न की।
इस समय देश में चारों ओर ‘मीटू’-‘मीटू’ आंदोलन से जुड़ने और खुद को कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की पीड़ित होने का दावा करते हुए सिनेजगत से लेकर राजनीतिक और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया तक के नामी गिरामी लोगों को कठघरे में खड़ा किया जा रहा है।
सोशल मीडिया पर लगाए जा रहे नित नए आरोपों की सच्चाई पुलिस की जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही सामने आ सकेगी, लेकिन फिलहाल तो ‘मीटू’ आंदोलन ने समाज के विभिन्न क्षेत्रों के अनेक महत्वपूर्ण लोगों को चरित्रहीन साबित करने और उनकी प्रतिष्ठा धूल धूसरित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।
इनमें से कई आरोप 15 से 20 साल पुरानी घटनाओं को लेकर हैं और सत्यता की कसौटी पर इनकी परख बाकी है। सरकार ने भी इस तरह के आरोपों की जांच के लिए एक समिति गठित कर दी है। इस समिति की अध्यक्षता सेवानिवृत्त न्यायाधीश करेंगे। लेकिन इस जांच से होगा क्या? अंतत: न्याय के लिए पुलिस जांच और फिर अदालती कार्यवाही ही विकल्प है। किसी भी व्यक्ति को ठोस साक्ष्यों के बगैर तो सजा दी नहीं जा सकती और एक दशक या उससे भी अधिक पुरानी घटनाओं के बारे में साक्ष्य जुटाना भी शिकायतकर्ता और पुलिस दोनों के लिए ही बहुत बड़ी चुनौती होगी।
इसमें दो राय नहीं कि केवल कार्य स्थल नहीं बल्कि अन्यत्र भी यौन उत्पीड़न और मानसिक उत्पीड़न की घटनाएं सुर्खियों में आती रही हैं। ऐसी घटनाओं के तूल पकड़ने और समय पर कानूनी रास्ता अपनाने की स्थिति में आरोपी के खिलाफ कार्रवाई भी हुई है।
कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से संरक्षण के लिए उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद 2013 में विस्तृत कानून बना जो देश में लागू है। दूसरी ओर, कार्य स्थल से इतर यौन शोषण की घटनाओं के मामले में भारतीय दंड संहिता के विभिन्न प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जाती रही है।
स्थिति यह होे गई है कि आज हर तरफ ‘मीटू’ के माध्यम से महिलाएं यौन शोषण के अनुभव साझा ही नहीं कर रहीं बल्कि ऐसा करने वाले कथित व्यक्तियों के नाम भी ले रही हैं। आलोक नाथ प्रकरण के परिप्रेक्ष्य में अनेक तरह के आरोप प्रत्यारोप लग रहे हैं और यहां तक कि समाज को भी नपुंसक बताने से गुरेज नहीं किया जा रहा है। लेकिन इस तरह की टिप्पणियां करते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इसी समाज और न्याय व्यवस्था में पंजाब पुलिस के पूर्व महानिदेशक केपीएस गिल, हरियाणा पुलिस के पूर्व महानिदेशक एसपीएस राठौर और कथा वाचक आसाराम को जहां दोषी पाया गया और सजा सुनाई गई, वहीं पर्यावरणविद आर के पचौरी और पत्रकार तरुण तेजपाल सरीखे अनेक प्रतिष्ठित व्यक्ति भी कानून के दायरे में आ चुके हैं। यही नहीं, उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश अशोक गांगुली पर भी इस तरह के आरोप लगे और शीर्ष अदालत ने इनकी जांच भी कराई।
न्यायमूर्ति गांगुली से संबंधित 24 दिसंबर, 2012 की घटना सामने आने पर उच्चतम न्यायालय ने न्यायमूर्ति आर एम लोढ़ा, न्यायमूर्ति एच एल दत्तू (दोनों बाद में प्रधान न्यायाधीश बने) और न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की समिति गठित की थी। इस समिति ने 27 नवंबर, 2013 को अपनी रिपोर्ट प्रधान न्यायाधीश पी सदाशिवम को सौंपी थी।
न्यायाधीशों की समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि युवती के बयान पहली नजर में न्यायमूर्ति गांगुली के अवांछित आचरण को दर्शाते हैं। न्यायमूर्ति गांगुली ने भी अपने बयान में इस तथ्य से इनकार नहीं किया था। इस रिपोर्ट पर न्यायालय के सभी न्यायाधीशों की बैठक में विचार के बाद फैसला लिया गया कि यह मामला उच्चतम न्यायालय के प्रशासनिक क्षेत्र में विचार योग्य नहीं है। एक ओर हम लैंगिक समानता और मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाते हैं और दूसरी ओर ठोस तथ्यों के बगैर ही सोशल मीडिया पर चर्चित लोगों का चरित्र हनन करने में संकोच नहीं कर रहे हैं। ऐसा करते समय यह भी ध्यान नहीं रखा जा रहा कि आरोपों के दायरे में आने वाले व्यक्तियों की प्रतिष्ठा भी मौलिक अधिकार के दायरे में आती है और इन्हें भी कुछ मानवाधिकार प्राप्त हैं।
उच्चतम न्यायालय ने संभवत: पहली बार 1997 में सारी परिस्थितियों और तथ्यों पर विस्तार से विचार के बाद कामकाजी महिलाओं को कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से संरक्षण प्रदान करने के लिए विस्तृत दिशा निर्देश जारी किए थे। साथ ही यह भी स्पष्ट किया था कि इस संबंध में उचित कानून बनने तक ये दिशा निर्देश प्रभावी रहेंगे।
इसके बावजूद, इच्छा शक्ति के अभाव का ही नतीजा था कि न्यायालय की इस व्यवस्था के आलोक में 2010 में पहली बार एक विधेयक तैयार हुआ लेकिन लोकसभा भंग हो जाने की वजह से परवान नहीं चढ़ सका। अंतत: 2013 में कार्य स्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निदान) कानून अमल में आया। यह कानून उस समय बना जब दिसंबर, 2012 में समूचे समाज को कलंकित करने वाला निर्भया सामूहिक बलात्कार और हत्या कांड हुआ। शर्मसार करने वाली इस बर्बर घटना के विरुद्ध उपजे आक्रोश ने जबर्दस्त आंदोलन का रूप ले लिया था। यह आंदोलन जरूरी भी था क्योंकि अक्सर इस तरह की बर्बर घटनाओं के प्रति पुलिस और प्रशासन का रवैया बहुत उदासीन और क्षेत्राधिकार को लेकर टाल मटोल करने वाला रहता है।
निर्भया कांड के बाद भारतीय दंड संहिता के विभिन्न प्रावधानों को कड़ा बनाया गया। अब तो देश में बलात्कार और यौन हिंसा जैसे संगीन अपराध के मामले में जीरो प्राथमिकी की व्यवस्था भी है। इसके तहत, पीड़ित या उसकी ओर से किसी भी स्थान पर प्राथमिकी दर्ज कराई जा सकती है और इसके बाद उसे घटना वाले क्षेत्र को स्थानांतरित किया जाता है।

चिराग तले अंधेरा
उच्चतम न्यायालय की 1997 की व्यवस्था और 2013 में बने कानून के बावजूद यौन उत्पीड़न की घटना से प्रभावित महिलाओं का पुलिस में कोई शिकायत या प्राथमिकी दर्ज न कराना भी काफी विस्मित करता है। ऐसा भी हुआ है कि ‘मीटू’ आंदोलन के इस दौर में कार्य स्थल पर यौन उत्पीड़न से महिलाओं को संरक्षण प्रदान करने के लिए दिशा निर्देश देने और इस संबंध में कानून बनाने के लिए सरकार को बाध्य करने वाले उच्चतम न्यायालय को 21 साल बाद इस वर्ष मई के महीने में सभी उच्च न्यायालयों और अधीनस्थ अदालतों में इसके लिए समितियां गठित करने का निर्देश देना पड़ा है। उच्च न्यायालयों को इस बारे में शीर्ष अदालत के निर्देश ने ‘चिराग तले अंधेरा’ कहावत को ही चरितार्थ कर दिया।
दिल्ली की तीस हजारी अदालत परिसर में एक महिला वकील के साथ हुई कथित घटना के मामले में उच्चतम न्यायालय ने सभी उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों से कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से महिलाओं को संरक्षण कानून 2013 के अनुरूप अपने यहां और सभी जिला अदालतों में दो महीने के भीतर इन समितियों का गठन करने के लिए कहा है, यदि इनका गठन नहीं किया गया है। शीर्ष अदालत के इस आदेश में यह जिक्र तो नहीं था कि विशाखा प्रकरण में प्रतिपादित कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से महिलाओं के संरक्षण और उनकी शिकायतों के समाधान के लिए समिति गठित करने के दिशानिर्देशों का कितने उच्च न्यायालयों और जिला अदालतों ने पालन नहीं किया है। लेकिन यह संकेत तो मिलता है कि इनकी संख्या एक से अधिक ही थी।
कार्य स्थल पर यौन उत्पीड़न से महिलाओं के संरक्षण और उनकी शिकायतों और समाधान के लिए उचित व्यवस्था न होने का तथ्य भी तीस हजारी अदालत में एक महिला वकील के साथ हुई घटना के बाद सामने आया। उच्चतम न्यायालय ने विशाखा प्रकरण में 1997 में प्रतिपादित दिशा निर्देशों के अनुरूप नवंबर 2013 में अपने यहां कार्य स्थल पर यौन उत्पीड़न से महिलाओं के संरक्षण के लिए दस सदस्यीय समिति गठित की थी। यह समिति शीर्ष अदालत के ही एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश अशोक कुमार गांगुली पर एक इंटर्न द्वारा यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए जाने के बाद गठित की गई थी। तीस हजारी अदालत परिसर में महिला वकील से हाथापाई की कथित घटना सामने आने से पहले उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश अशोक कुमार गांगुली का मामला भी सुर्खियों में आया था। यही नहीं, इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच में भी कुछ युवा महिला वकीलों ने अदालत परिसर में यौन उत्पीड़न की शिकायत के साथ याचिका दायर की थी।
भारतीय कानूनों में यौन उत्पीड़न और कामकाजी महिलाओं को कार्यस्थल पर यौन शोषण से संरक्षण प्रदान करने संबंधी कठोर प्रावधान हैं। सोचना जरूरी है कि इसके बावजूद इस तरह की घटनाओं के लिए कोई कानूनी कदम उठाने की बजाय सीधे ‘मीटू’ आंदोलन के माध्यम से दूसरों को कथित रूप से चरित्रहीन साबित करने के इस अभियान से उठ रहे विवाद का समाधान कैसे होगा? यदि आरोप साबित नहीं हुए तो उन लोगों की प्रतिष्ठा का क्या होगा जिन्हें इस अभियान में प्रमुखता से निशाना बनाया जा रहा है। 

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