माधव ने दिया सहयोगी दलों को मौका

भाजपा के महासचिव राम माधव के बयान के बाद सहयोगी दलों को मोल-तोल करने का नया मौका मिल गया है. बता दें, माधव ने कहा है कि चुनाव के बाद भाजपा को नए सहयोगी दलों की जरूरत पड़ सकती है. इसके बाद भाजपा के सारे सहयोगी दलों को लगने लगा कि अगर भाजपा को बहुमत नहीं मिला, तो उन्हें बेहतर मौका मिलेगा. गौर करने वाली बात यह है कि पिछली बार भाजपा को अपने दम पर बहुमत मिल गया था, जिसके बाद उसने सहयोगी दलों को ज्यादा घास नहीं डाली थी. 17 सांसदों वाली शिवसेना का केवल एक कैबिनेट मंत्री बनाया गया. इसी तरह चंद्रबाबू नायडू की पार्टी का भी सिर्फ एक कैबिनेट मंत्री था और सहयोगी होने के बावजूद जब चंद्रबाबू नायडू अपने राज्य के लिए कुछ खास नहीं करा पाए, तो वह राजग से अलग हो गए. लोजपा के भी छह सांसद थे, पर मंत्री पद एक ही मिला. अब सहयोगी दलों को लग रहा है कि भाजपा बहुमत से दूर रह जाएगी और तब उनकी पूछ बढ़ेगी. सूत्रों का कहना है कि अगर भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता है, तो शिवसेना समर्थन देने की बड़ी कीमत वसूलेगी. शिवसेना के बाद जदयू ने भी तेवर दिखाए हैं. उसने बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग एक बार फिर शुरू कर दी है.

फोनी का नवीन अध्याय

फोनी चक्रवात के बाद नवीन पटनायक का एक नया अध्याय शुरू होने की संभावना पर चर्चा हो रही है. राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि नवीन पटनायक को राजग में शामिल करने का प्रयास तेज हो गया है. बता दें कि फोनी चक्रवात के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की जमकर तारीफ की. इसके बाद से ही कयास लगाए जाने लगे. माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी नए सहयोगियों की तलाश करने लगे हैं. उनकी नजर में सबसे अहम नाम नवीन पटनायक का है. ध्यान रहे, चुनाव प्रचार में भी पटनायक पर वैसा हमला नहीं किया गया, जैसा दूसरे विपक्षी दलों पर हुआ. भाजपा ने अपने इस पुराने सहयोगी के प्रति सद्भाव दिखाया. भाजपा को चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए सहयोगियों की जरूरत होगी, इसके संकेत कई बातों से मिले हैं. राम माधव से पहले सुब्रह्मण्यम स्वामी ने भी कहा था कि अगर भाजपा 220 सीटें जीतती है और सहयोगी दलों को 30 सीटें मिल जाती हैं, तब भी सरकार बनाने के लिए अन्य सहयोगियों की जरूरत होगी. एक कारण यह भी है कि भाजपा को एनडीए के अपने सभी सहयोगियों पर पूरा भरोसा नहीं है, इसलिए पटनायक को अपने साथ लाने की कोशिश हो रही है.

केसीआर की नजर अब दिल्ली पर

दक्षिण भारतीय राजनीति में सक्रिय तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव की नजर अब दिल्ली की गद्दी पर है. लोकसभा चुनाव की घोषणा के बाद से ही वह कांग्रेस और भाजपा के अलावा तीसरा मोर्चा बनाने के लिए प्रयास कर रहे हैं. केसीआर ने इसके लिए पहले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एवं ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से मुलाकात करके तीसरा मोर्चा बनाने की अपील की थी. हालांकि, इन तीनों ने केसीआर के अनुरोध को ज्यादा तवज्जो नहीं दी, लेकिन उनका अभियान अभी रुका नहीं है. केसीआर ने हाल में दक्षिणी राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक की है. उन्होंने केरल जाकर मुख्यमंत्री पिनरई विजयन से मुलाकात की. हालांकि, विजयन सीपीएम नेता हैं और उनकी पार्टी की अखिल भारतीय पहुंच है, लेकिन फिर भी केसीआर ने विचारों की परवाह किए बिना उनसे मुलाकात करके दिल्ली की राजनीति पर चर्चा की. इसके अलावा उन्होंने कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी से भी मुलाकात की. बता दें कि कर्नाटक में जेडीएस का कांग्रेस के साथ गठबंधन है और कांग्रेस के समर्थन से ही वह मुख्यमंत्री बने हुए हैं. लेकिन फिर भी, केसीआर उन्हें केंद्रीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए तैयार करने का प्रयास कर रहे हैं. इसे पहले केसीआर ने वाईएसआर कांग्रेस प्रमुख जगन मोहन रेड्डी से मुलाकात की थी और अब भी उनसे लगातार संपर्क में हैं. इस तरह देखा जाए, तो लगता है कि गैर भाजपा और गैर कांग्रेस राजनीतिक दलों का एक नया मोर्चा बनाने की कोशिश में लगे केसीआर की नजर दिल्ली की कुर्सी पर है.

बागी शकील और कांग्रेस की चुप्पी

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बिहार के दिग्गज कांग्रेसी नेता डॉ. शकील अहमद बागी हो गए, लेकिन पार्टी का रुख नरम है. दरअसल, डॉ. शकील अहमद कांग्रेस से नहीं, बल्कि महागठबंधन से नाराज हैं और उन्होंने इसी कारण महागठबंधन के खिलाफ निर्दलीय चुनाव लडऩे का फैसला लिया. कांग्रेस के इस नेता ने पार्टी के प्रवक्ता पद से इस्तीफा दे दिया, लेकिन वह पार्टी से अलग नहीं हुए. गौरतलब है कि मधुबनी से दो बार सांसद रहे डॉक्टर शकील अहमद को टिकट नहीं दिया गया, इसलिए उन्होंने निर्दलीय चुनाव लडऩे का फैसला किया. कांग्रेस कोई कार्यवाही करने को तैयार नहीं है. बिहार में कांग्रेस के साथ गठबंधन करने वाली दूसरी पार्टियां उसके इस रवैये से परेशान हैं. माना जाता है कि इसका कारण कांग्रेस का राजद से बदला लेना है. बता दें कि सुपौल में कांग्रेस की उम्मीदवार रंजीत रंजन के खिलाफ राजद ने एक निर्दलीय उम्मीदवार को समर्थन दे दिया, तो चतरा में कांग्रेस के मनोज यादव के मुकाबले सुभाष यादव को उम्मीदवार बना दिया. ऐसे में, अगर शकील मधुबनी सीट से राजद को चुनौती दे रहे हैं, तो कांग्रेस उन पर कार्यवाही क्यों करे!

मोदी से राज की नाराजगी का रहस्य

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे आजकल मोदी के खिलाफ हैं. पूरे चुनाव के दौरान उन्होंने न केवल मोदी और भाजपा के खिलाफ प्रचार किया, बल्कि कई साक्षात्कारों के दौरान केंद्र सरकार की नीतियों पर भी हमला किया. यह वही राज ठाकरे हैं, जो कभी मोदी की प्रशंसा करते हुए थकते नहीं थे. लेकिन, इन दिनों वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के खिलाफ आग उगल रहे हैं. दरअसल, राज ठाकरे का मोदी विरोध पूरी तरह से राजनीतिक है. शिवसेना के साथ भाजपा का गठबंधन होने से पहले तक उन्हें इस बात की उम्मीद थी कि महाराष्ट्र में भाजपा उनके साथ गठबंधन करेगी और मोदी के सहारे उनके भी एक-दो सांसद बन जाएंगे. लेकिन, जैसे-जैसे चुनाव की तारीख नजदीक आई, उनकी उम्मीदें टूटने लगीं और जब भाजपा-शिवसेना ने गठबंधन कर लिया, तो वह पूरी तरह निराश हो गए और उसके बाद उन्होंने मोदी की नीतियों का विरोध करना शुरू कर दिया.

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