भेदभाव के शिकार बांग्लादेश के बिहारी मुसलमान

अभिषेक रंजन सिंह

ढाका।

बांग्लादेश में रहने वाले उर्दू भाषी बिहारी मुसलमान दशकों से गैर बराबरी के शिकार रहे हैं। हालांकि, हालात अब पहले से कुछ बेहतर है, लेकिन देश की चुनावी राजनीति और सरकारी नौकरियों में इनकी भागीदारी अब भी सिफर है। इन लोगों को बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और जमात-ए-इस्लामी का समर्थक माना जाता है। बांग्लादेश में इन्हें इसलिए भी हिकारत भरी निगाहों से देखा जाता है, क्योंकि ये लोग पाकिस्तान के विभाजन के खिलाफ थे और इन्होंने वर्ष 1971 के मुक्ति युद्ध में पाकिस्तानी फौज का साथ दिया था। राजधानी ढाका में बिहारी मुसलमानों की कुल आबादी 1,25,000 हजार है। जबकि पूरे बांग्लादेश में इनकी तादाद 7,50000 है। 1947 के भारत विभाजन के समय तकरीबन 14 लाख उर्दू भाषी मुसलमान पूर्वी पाकिस्तान ( अब बांग्लादेश) गए थे। वहां जाने वालों में ज्यादातर बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के मुसलमान थे। हालांकि इनमें काफी लोग कुछ ही दिनों बाद वापस भी लौट आए, क्योंकि वहां की संस्कृति और जबान उन्हें रास नहीं आई। इनमें से करीब 1,70,000 लोग बाद में पाकिस्तान चले गए। वर्षों इंतजार के बाद 10 जनवरी 1993 में बांग्लादेश से 325 लोगों का एक जत्था पाकिस्तान के शहर कराची जाकर बस गया। ये सभी लोग यह सोचकर पाकिस्तान गए थे कि यहां उन्हें खुशनुमा जिंदगी मिलेगी, लेकिन वहां उनकी जिंदगी मुहाजिरों से भी बदतर हो गई। इन लोगों को पाकिस्तानी खुले दिल से स्वीकार नहीं कर रहे हैं। वापस बांग्लादेश जा नहीं सकते और भारत आने का कोई सवाल ही नहीं है। सत्तर के दशक में मुक्ति युद्ध के दौरान बिहारी मुसलमानों ने पाकिस्तान का समर्थन किया और बांग्लादेश बनने के बाद संपन्न लोग पाकिस्तान चले गए। गरीबों के लिए पाकिस्तान जाना मुमकिन नहीं था, नतीजतन वे शरणार्थियों की मानिंद आज भी बांग्लादेश में रह रहे हैं। बिहारी मुसलमान भले ही पाकिस्तान का समर्थन किया हो, लेकिन पाकिस्तान ने कभी भी इन लोगों के प्रति हमदर्दी नहीं दिखाई।

मोहम्मदपुर कैंप की रहने वाली सायदा सुल्ताना बेगम बताती हैं, मेरे चाचा मुश्ताक अली अपनी बीबी-बच्चों के साथ कराची गए, लेकिन वहां उनकी जिंदगी जहन्नुम बन गई है। यह कहानी सिर्फ एक मुश्ताक की नहीं है, बल्कि बांग्लादेश से पाकिस्तान गए उन तमाम लोगों की है वहां रहने का फैसला किया। कुछ साल पहले उनका इंतकाल हो गया। वह जब भी फोन करते थे, तो एक ही बात कहते थे इस जिंदगी से बेहतर है कि मौत आ जाए।  जाने वालों ने सोचा था कि वहां उन्हें बेहतर जिंदगी मिलेगी, लेकिन उनकी हालत मुहाजिरों से भी बदतर हो गई। कराची में भी इनकी जिंदगी बद से बदतर है। पाकिस्तान में अल्ताफ हुसैन की अगुवाई वाली मुत्तहिदा कौमी मूवमेंट को छोड़कर दीगर सियासी पार्टियों को बिहारी मुसलमानों की कोई चिंता नहीं है। मीरपुर कैंप में रहने वाली सितारा परवीन ढाका में गारमेंट्स फैक्ट्री में काम करती हैं। भारत विभाजन के वक्त उनका परिवार बिहार के मुंगेर से ढाका आकर बसा था। बांग्लादेश बनने से पहले बिहारी मुसलमानों की हालत अच्छी थी। लेकिन बाद में हालात खराब हो गए। बांग्लादेश के बंगाली मुसलमान उन्हें देशद्रोही समझती है, जबकि यह पूरी सच्चाई नहीं है।

ढाका में बिहारी मुसलमानों और बंगाली मुसलमानों के बीच अक्सर खूनी संघर्ष की घटनाएं होती हैं। कभी त्योहार के नाम पर तो कभी अपनी रवायत के नाम पर। इन घटनाओं में अक्सर कई जिंदगियां जाया होती हैं। हताहत होने वाले ज्यादातर बिहारी मुसलमान ही होते हैं। साल 2014 की बात करें, मीरपुर कैंप में एक बिहारी मुसलमान परिवार को घर में बंद कर जिंदा जला दिया गया। इस घटना में नौ लोगों की मौत हो गई थी। विवाद शब-ए-बारात के मौके पर पटाखे फोड़ने को लेकर शुरू हुई थी। देखते ही देखते यह खूनी संघर्ष में तब्दील हो गया। सामाजिक कार्यकर्ता जैनब खातून बताती हैं, ढाका में बिहारी मुसलमानों को निशाना बनाने के लिए सिर्फ एक बहाना चाहिए। उनके मुताबिक, स्थानीय पुलिस-प्रशासन का रवैया भी बिहारी मुसलमानों के प्रति सकारात्मक नहीं है।

 

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