न्यूज फ्लैश

फर्श पर गिरे मिले अर्श पर टंगे नाम

विजयशंकर चतुर्वेदी

हैशटैग मीटू (#मीटू) अभियान ने भारत के सांस्कृतिक महल को किसी भूकंप की तरह जोर का झटका दे दिया है। बड़े-बड़े माननीयों और पूजनीयों की आल्मारियों में छिपे कंकाल किसी मलबे की तरह सड़क पर लुढ़कते चले आ रहे हैं और विभिन्न क्षेत्रों के दिग्गजों की ओढ़ी हुई इज्जत की कलई खुलती जा रही है। यह अभियान बड़े-बड़े पदों पर बैठे ताकतवर संभ्रांत पुरुषों के मुखौटे के पीछे छिपे अपराधी व्यक्तियों को भी सामने ला रहा है। न्यायालयों का फैसला आने तक इंतजार करने की बातें महज तकनीकी कवायद हैं, क्योंकि इस अभियान को कानूनी सजा दिलाने से कहीं अधिक एक सामाजिक कोढ़ उघाड़ने की दृष्टि से देखा जा रहा है। नारी की स्वतंत्र चेतना पुरुष प्रधान सत्ता-तंत्र को ललकारने की हिम्मत जुटा रही है। आज मेगास्टार अमिताभ बच्चन और सुपरस्टार ऋतिक रोशन तक इसकी तपिश महसूस कर रहे हैं!
नारी पूजा को प्रतिष्ठा दिलाने वाले भारत जैसे महान देश में महिलाओं के यौन शोषण का कलंक जिस बड़े पैमाने पर स्वयं फिल्म अभिनेत्री तनुश्री दत्ता, कंगना राणावत, चित्रांगदा सिंह, संध्या मृदुल सिंह, दीपिका अमीन, गायिका श्वेता पंडित, सोना महापात्रा, लेखिका विंता नंदा, हेयर स्टाइलिस्ट सपना भावनानी, पत्रकार प्रिया रमानी, गजाला वहाब, निष्ठा जैन जैसी अनगिनत घोषित और अनाम पीड़ित महिलाओं द्वारा खुले में दिखाया गया है, उसने जीवन के हर क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया है। विंता नंदा और संध्या मृदुल की गंभीर प्रकृति को मैं अपने प्लस चैनल के दिनों से निजी तौर पर जानता हूं। मगर रोज नए मामले सामने आ रहे हैं, प्रतिप्रश्न उठ रहे हैं। मीटू की उड़ान के इस माहौल में प्रसिद्ध कवि-पत्रकार विमल कुमार की एक बेहद मौजू कविता सामने आई है-
‘तुम पर यकीन किया/ पर तुम क्यों नहींं बोले/ कि तुम छल करते हो/ शिकार की तलाश में रहते हो हरदम/ मैं जब बोलने लगी हूं/ तो तुम बोल रहे हो/ कि उस समय क्यों चुप थी/ मैं तुमसे पूछना चाहती हूं/ तुम क्यों नहीं बोले/ कि तुम इतने बेशर्म हो/ हो इतने अश्लील/ ताकत का प्रदर्शन करने के लिए/ छिपाने के लिए अपने गुनाह/ एक फौज ही खड़ी कर देते हो अदालत में/ तुम क्यों नहीं बोले उस वक़्त/ कि तुम्हारा काम इसी तरह अपराध करते हुए/ खुद को निर्दोष साबित करना है/ तुम बोलो या न बोलो/ तुम्हारी कलई खुल गई है सबके सामने।’
यह सकारात्मक है कि निडर महिलाएं अपनी आपबीती सार्वजनिक करने का साहस जुटा रही हैं और इसकी सुनामी आई हुई है। लेकिन इसमें गौर करने की बात यह है कि पीड़ित महिलाएं उन्हीं घटनाओं पर मुंह खोल रही हैं जो उनके साथ 10-20 साल पहले घटित हुई थीं। ऐसा एक भी नाम सामने नहींं आ रहा है, जो यह बताए कि उसके साथ बीते साल भर में या पिछले हफ्ते यौन उत्पीड़न की कौन-सी घटना हुई। तो क्या अब सब कुछ ठीक-ठाक हो गया है या वही शक्ति-संरचना अब भी काम कर रही है, जो महिलाओं को तब मुंह खोलने नहींं देती थी? शायद इसीलिए प्रश्न उठ रहे हैं कि जब घटना हुई थी तब खामोशी क्यों ओढ़ ली गई! क्या सारा मामला सिर्फ सोशल मीडिया पर वाहवाही और लाइक्स बटोरने या हॉलीवुड से पीछे न दिखने की होड़ तक सीमित होकर रह गया है? क्या भारतीय समाज उस गहराई तक आ पहुंचा है, जहां ऐसे नारी अभियानों की पीड़ा समझी जा सके और उसका मजाक न उड़ाया जाए? क्या इसका एक बड़ा नकारात्मक असर यह नहींं होगा कि आरोप लग जाने के भय से महिलाओं को काम पर रखने से पहले सौ बार सोचा जाएगा?
इस आशंका से इसलिए भी इनकार नहींं किया जा सकता कि हमारे देश में कुर्सी पर बैठा हर व्यक्ति नौकर होते हुए भी खुद को स्वंभू स्वामी समझता है, वह जिसको चाहे काम पर रखना, पदोन्नति देना, इंक्रीमेंट देना, टॉप कराना, टीवी-फिल्म में भूमिका देना आदि अपनी मुट्ठी में ही समझता है। इस पुरुष सत्ता की चूलें भले न हिली हों, लेकिन इतना तो तय है कि हैशटैग मीटू अभियान से अब केंद्र सरकार हिल गई है। इसे खुशफहमी कहा जाए या चौतरफा दबाव का असर कि लेखिका विंता नंदा द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे मार्मिक और जिम्मेदारी भरे सीधे पत्र का असर यह हुआ कि शक्तिशाली केंद्रीय मंत्री एमजे अकबर को उस सरकार से इस्तीफा देना पड़ा, जहां बकौल केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह- ‘हमारी सरकार में इस्तीफे नहींं होते।’
भारत में बॉलीवुड, मीडिया, स्पोर्ट्स जैसे क्षेत्रों से कई महिलाएं सामने आकर हैशटैग मीटू के जरिये अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न की बातें सामने रख रही हैं। यह अभियान अब राजनीतिक हलकों तक भी पहुंच गया है। बॉलीवुड में सबसे पहले तनुश्री दत्ता ने नाना पाटेकर पर यौन शोषण के आरोप लगाए। नाना के बाद बॉलीवुड में गायक कैलाश खेर, निर्देशक विकास बहल और विवेक अग्निहोत्री, अभिनेता रजत कपूर और आलोक नाथ जैसे बड़े नाम उजागर हुए हैं। इस सूची में न्यूज पोर्टल द क्विंट के पत्रकार मेघनाद बोस, हिंदुस्तान टाइम्स के पत्रकार प्रशांत झा, हास्य कलाकार तन्मय भट्ट, गुरुशरण खंभा का नाम भी शामिल हो गया है। केंद्र में मंत्री रहे और पूर्व संपादक एमजे अकबर पर दसियों महिला पत्रकारों ने समय-समय पर किए गए यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं। एक महिला पत्रकार ने बीसीसीआई के सीईओ राहुल जौहरी पर नौकरी के बदले अनुचित बर्ताव का आरोप लगाया है। एक महिला फ्लाइट अटेंडेंट ने गायक अभिजीत भट्टाचार्य पर एक पब में छेड़छाड़ का आरोप लगाया है। अभिनेत्री बिपाशा बसु और निर्देशिका सलोनी अरोड़ा ने शूटिंग के समय निर्देशक साजिद खान के अश्लील व्यवहार के किस्से सार्वजनिक कर दिए हैं।
यौन शोषण की परिधि में बलात्कार के अलावा किसी महिला को अभद्र संदेश भेजना, अश्लील बातचीत करना, गलत ढंग से स्पर्श करना और कामुक इरादों से घूरना तक शामिल है। गायक-संगीतकार रघु दीक्षित पर एक गायिका का रिकॉर्डिंग के दौरान जबरन चुंबन करने का मामला ट्विटर पर सामने आया है। प्रतिष्ठित पत्रकार विनोद दुआ पर एक संघर्षशील महिला पत्रकार का पीछा करने और अपनी कार में उससे छेड़छाड़ करने के आरोप लगे हैं। शोमैन के नाम से मशहूर फिल्मकार सुभाष घई पर नशीला पेय पिलाकर बलात्कार करने का आरोप एक महिला ने लगाया है। सेलेब्रिटी सलाहकार और लेखक सुहैल सेठ पर चार महिलाओं ने यौन शोषण के लांछन मढ़े हैं। अंग्रेजी उपन्यासों के प्रसिद्ध लेखक चेतन भगत भी मीटू के लपेटे में हैं। पत्रकार-लेखक सीपी सुरेंद्रन के खिलाफ 11 महिलाओं ने उन्हें गलत ढंग से छूने की बमबारी की है। शक्ति कपूर, पीयूष मिश्रा, कुषाण नंदी, भूषण कुमार, सुभाष कपूर पर भी यौन शोषण के आरोप जड़े जा चुके हैं। यानी यह सूची अब अंतहीन होती जा रही है और अर्श पर चमक रहे कई नाम फर्श पर आ गए हैं। इनमें से कुछ सरेआम माफी मांग रहे हैं या अदालत का दरवाजा खटखटा रहे हैं। इसमें कोई बुराई भी नहींं है क्योंकि जिस देश में संसद हमले के गुनहगार अफजल गुरु और मुंबई हमले के दुर्दांत आतंकवादी अजमल कसाब को कोर्ट में अपना बचाव करने का पर्याप्त मौका दिया जाता है, वहां यौन शोषण के आरोपियों की सफाई क्यों नहींं सुनी जानी चाहिए?
विडंबना यह है कि इस दौर में कोई भी अभियान या आंदोलन जितनी तेजी से उदित होता है, उससे भी कम समय में अस्त हो जाता है। सोशल मीडिया हमेशा किसी ट्रेंड को फॉलो करने की जल्दी में रहता है और मीटू के मामले में यही दिख रहा है। लड़की से साथ कोई दुर्व्यवहार हुआ- लोग इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दे रहे। चटखारे लेकर इस पर ज्यादा ध्यान है कि पूरा घटनाक्रम क्या रहा। मीटू के इंटरनेट सेंसेशन बन जाने का नुकसान यह हुआ है कि लोग लड़कियों के साथ घटी सामान्य घटनाओं की पोस्ट को भी उसी खांचे में फिट करके प्रतिक्रियाएं देने लगे हैं। हैशटैग मीटू के साथ उपर्युक्त आशंकाओं को खत्म करने के लिए स्वतंत्र पत्रकार और रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की सदस्य रितुपर्णा चटर्जी ने ट्विटर पर #कल्ल्िरंटीळङ्मङ्म नामक हैंडल से ट्विटर अकाउंट बनाया है। इस अकाउंट का मकसद इस समय हैशटैग मीटू से जुड़ी मीडिया में छपी सारी खबरें, आवाजें और पोस्ट को एक जगह सहेज कर रखना है ताकि वे अंधेरे में न खो जाएं और यह अहम मुद्दा टीवी बहसों के सर्कस में तब्दील होकर न रह जाए।
भारत में हैशटैग मीटू अभियान का श्रीगणेश करने का श्रेय भले ही फिल्म अभिनेत्री तनुश्री दत्ता को जाए लेकिन वास्तव में इसका जन्म करीब 11 साल पहले मायस्पेस नामक सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर हो चुका था। तब यह एक जनजागृति अभियान था। उस अभियान का उद्देश्य रंग और लिंग के आधार पर भेदभाव के विरुद्ध लड़ना था। अमेरिका की अश्वेत सामाजिक कार्यकर्ता टेराना बुर्के ने 2006 में मीटू अभियान के जरिये 12 से 16 साल की बच्चियों, गरीब महिलाओं और नस्लवादी यौन हिंसा की शिकार महिलाओं की मदद करना शुरू किया था। तब इस पर ज्यादा ध्यान नहींं दिया गया। लेकिन पिछले वर्ष यूनिसेफ के एड्स अभियान से जुड़ी अभिनेत्री अलीसा मिलानोने हॉलीवुड के फिल्म निर्माता हॉर्वे विंसटाइन के खिलाफ जब मीटू में हैशटैग जोड़ कर सबसे पहले अपनी बात कही तो हंगामा मच गया। 15 अक्टूबर 2017 को यौन हिंसा के खिलाफ यह हैशटैग अभियान शुरू हुआ और इसके तहत जिन सूचनाओं, संवादों, वीडियो आदि को शेयर किया गया, वे होश उड़ाने वाले थे।
इस मीटू को पहले दिन ही दो लाख बार से ज्यादा इस्तेमाल किया गया और अगले दिन तो इसकी संख्या करीब पांच लाख हो गई। फेसबुक पर भी मीटू ट्रेंड में आ गया और 47 लाख से अधिक लोगों ने करीब सवा करोड़ पोस्ट इस हैशटैग से शेयर कर डालीं। तब इस मीटू को इस्तेमाल करने वाले 45 फीसदी लोग अमेरिका के थे। लाखों महिलाओं ने इस हैशटैग के जवाब सोशल मीडिया पर लिखे, जिनमें दुनिया की जानी-पहचानी हस्तियां शामिल थीं। देखते ही देखते 85 देशों में इस हैशटैग के साथ प्रतिक्रियाएं व्यक्त की गर्इं। भारत, पाकिस्तान, ब्रिटेन, फिलीपींस और चीन आदि कई देशों में लोगों ने नामजद अनुभव शेयर किए।
इसकी ताकत, पहुंच और प्रभाव का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ‘टाइम’ पत्रिका ने किसी व्यक्ति को नहींं बल्कि हैशटैग मीटू को ‘पर्सन आॅफ द ईयर 2017’ घोषित किया था। इस विश्वविख्यात पत्रिका ने महिलाओं के साथ हुई यौन प्रताड़ना, हिंसा और शोषण के दोषी लोगों के नाम उजागर करने वाले इस हैशटैग को अभियान बनाने में जुटे लोगों को ‘द साइलेंस ब्रेकर्स’ नाम दिया। यूरोप की संसद में जगतव्यापी मीटू अभियान के जवाब में एक विशेष सत्र बुलाया गया। ब्रिटेन में मीटू के आधार पर की गई शिकायतों पर जांच अधिकारी बिठाए गए। अब भारत में भी इसका असर दिखना शुरू हो गया है। कोंकणा सेन शर्मा, नंदिता दास, मेघना गुलजार, गौरी शिंदे, रीमा कागती, जोया अख्तर, किरण राव, अलंकृता श्रीवास्तव, नित्या मेहरा, रुचि नरेन और शोनाली बोस ने एक साझा बयान जारी करके स्पष्ट कर दिया है कि वे यौन शोषण के आरोप में दोषी साबित होने वाले किसी भी व्यक्ति के साथ काम नहींं करेंगी।
आज राजनीतिक क्षेत्र की महिलाएं भले ही कुछ न बोल रही हों लेकिन केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने खुल कर कहा- ‘किसी भी औरत को मुंह से शर्मिंदा करो या छूकर शर्मिंदा करो, वह औरत कभी उसे भूलती नहींं; चाहे वह 80 साल की हो।’ इसे मेनका गांधी का साहस भरा सकारात्मक बयान समझा जाना चाहिए। मीटू अभियान में यौन उत्पीड़न के एक के बाद एक हो रहे खुलासे से केंद्र सरकार ने भी अपनी जिम्मेदारी समझी है। उसने चार सेवानिवृत्त जजों की एक समिति गठित करने का फैसला किया है, जो कि मीटू मामलों की जांच और कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकने के कानून को प्रभावी ढंग से लागू करने का एक अभेद्य तंत्र स्थापित किए जाने का खाका तैयार करेगी।
मीटू की आपाधापी में संभव है कि कुछ महिलाएं निजी कुंठा और किसी से पुराना हिसाब चुकता करने के इरादे से झूठे आरोप भी मढ़ रही हों। कई मामले ऐसे भी हो सकते हैं जहां महिलाओं ने अपने रूपवती होने का बेजा फायदा उठाया हो और किसी पुरुष को नीचा दिखाकर आगे बढ़ गई हों। लेकिन फिल्म जगत हो या कोई अन्य क्षेत्र, महिलाओं का यौन शोषण कोई ढका सत्य नहींं है। वरिष्ठ पत्रकार तवलीन सिंह की यौन हिंसा से संबंधित एक खबर को संपादक ने यह कह कर छापने से मना कर दिया था कि ‘तुम अपना समय बर्बाद कर रही हो।’ लेकिन वर्तमान मीटू अभियान की सीमा यह है कि यह यौन शोषण को केवल कुछ व्यक्तियों के अपराध तक सीमित कर रहा है। यह घर-बाहर हो रही यौन उत्पीड़न घटनाओं को सामंती और पुरुष सत्तात्मक समाज के मनोरोग के रूप में चिन्हित करने की तरफ जोर नहींं दे पा रहा है। अंतर्विरोध यह भी है कि जो फिल्म उद्योग काल्पनिक कहानियों, उत्तेजक गानों, अश्लील दृश्यों, द्विअर्थी संवादों आदि के माध्यम से महिलाओं को छेड़ने के तरह-तरह के औजार भारतीय समाज को उपलब्ध कराता है, महिलाओं को एक उत्पाद और जिंस की भांति प्रस्तुत करता है- सबसे ज्यादा शिकायतें वहीं से आ रही हैं।
गौरतलब है कि फिल्म लेखिका विंता नंदा और पत्रकार प्रिया रमानी ने अपने यौन शोषण के बारे में वर्षों पहले ही लेख लिख कर खुलासा कर दिया था, लेकिन किसी ने उस पर चर्चा करने की जरूरत तक नहींं समझी थी! आज हैशटैग मीटू को जब प्रबल वेग मिला है तो कोई भी गरमागरम मौका लपक लेने वाले मीडिया का एक बड़ा हिस्सा इससे कदमताल करते हुए मॉब लिंचिंग की मानसिकता में आ चुका है। फौरी और अतिरिक्त सनसनी की वजह से वे आवाजें कहीं दब कर रह गई हैं जिन्हें वाकई ऐसे किसी सशक्त आंदोलन की बरसों से जरूरत थी। असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली अनगिनत महिलाएं अब भी चुप हैं। आदिवासी इलाकों में पुलिसिया लैंगिक दमन की शिकार अनगिनत महिलाएं तो इस अभियान से परिचित ही नहींं हैं। करीबी रिश्तेदारों के लैंगिक शोषण का शिकार हुई महिलाओं की आवाज भी इसमें शामिल नहींं है। साहित्य और कला जगत की यौन सौदेबाजी अभी परदे में ही छिपी है।
मीटू एक अंतहीन सिलसिला है। इसका राजनीतिक रूप से दुरुपयोग होने के खतरे भी कम नहींं हैं। स्टिंग आॅपरेशन के दौर में हमने कई चरित्रवान चेहरों को कलंकित होते देखा है। अगर चुनावी बढ़त लेने के इरादे से मीटू को औजार बनाया गया तो यह महज एक प्रहसन बन कर रह जाएगा और कई सच्चे मामले भी झूठे नजर आने लगेंगे। हर राजनीतिक दल मीटूग्रस्त हो जाएगा और भारतीय राजनेता दुनिया में मुंह दिखाने लायक नहींं रह जाएंगे। फिलहाल महिलाएं बाहर होने वाले उत्पीड़न को तो बता पा रही हैं, लेकिन घर के अन्दर होने वाले यौन अत्याचार का मीटू करने से डर रही हैं। इसको बयान करने का अर्थ होगा परिवार नामक पारम्परिक संस्था का मवाद साफ करके उसे स्वच्छ और स्वस्थ रूप प्रदान करना। हैशटैग मीटू अभियान कार्यस्थल या गोपनीय स्थल के यौनशोषण की दीवारें तोड़ कर यदि घर की चारदीवारी में घुस सका, तभी भारत में इसकी सार्थकता पूर्ण होगी। 

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