पितृ दोष और श्राद्ध क्या है : श्रीश्री रविशंकर

पितृ दोष क्या है

पितृ दोष वह है जब एक आत्मा अपने पुत्रों या पुत्रियों के बारे में अच्छी भावनाएं नहीं रखती। इसका एक उपाय है जिसे ‘तर्पण’ कहते हैं। जो स्वर्गवासी हो गए हैं, उन्हें हम तिल अर्पण करते हैं और कहते हैं कि आपके मन में जो भी बातें चल रहीं थीं, वे सब तिल के समान छोटी हैं। तो जब माता-पिता की मृत्यु हो जाती है, तब बच्चे पानी में कुछ तिल के बीज डालते हैं और माता-पिता को समझाते हैं कि उन्हें तिल के समान छोटी-छोटी सांसारिक बातों की चिंता नहीं करनी चाहिए, बल्कि आगे बढ़ना चाहिए। मरने के बाद भी पुत्र या पुत्री शव के कान में यही ज्ञान देते हैं।

श्राद्ध क्या है ?

इसलिए कहते हैं, कि यदि पुत्र या पुत्री नहीं है तो मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती। क्यों? अगर जीवित रहते किसी ने उन्हें यह ज्ञान नहीं दिया, तब कम से कम उन्हें मरने के बाद अपने बेटे या बेटी से यह ज्ञान प्राप्त हो जाएगा। यही श्राद्ध  है। यह विश्व की हर संस्कृति में होता है। चीन में, एक दिन वे कागज़ की बनी सभी चीज़ें जलाते हैं। सिंगापुर में भी, उन्हें (पितरों को) जो भी चाहिए होता है वे कागज़ में उसे बनाकर जला देते हैं। वे ऐसा मानते हैं कि वे जो भी जलाएंगे, वो मृत लोगों के आशीर्वाद से उन्हें वास्तव में प्राप्त हो जाएगा। इसी तरह की मान्यता दक्षिण अमरीका में भी है। मुख्य बात यह है कि आप मृत लोगों से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

तो इस विश्वास के साथ, आप दिल से दान करते हैं और यही तर्पण है। अब देखा जाए तो जीवन में लेना-देना तो चलता ही है। लेकिन देने के लिए अगर कोई सबसे उत्तम चीज़ है, तो वह है ज्ञान। यदि आप चाहते हैं कि मृत लोगों को तृप्ति मिले, तो आप गरीब लोगों को भोजन करा सकते हैं। जिन लोगों को आपने खाना खिलाया है, उनके आशीर्वाद से मृत लोगों को सहायता मिलती है। ऐसा कहते हैं कि किसी के मरने के बाद 10 दिन तक आपको जितना रोना है उतना रो लीजिये। जो माँगना है वो मांग लीजिये। उसके बाद अपनी आँखों में घी लगाकर आनंद हवन करिए। ऐसा समझिये कि वह आत्मा जब तक जीवित थी, वह प्रेम स्वरुप थी और अब वह तृप्त है। इस हवन के बाद घर में ख़ुशी मनाई जाती है और हवन की अग्नि से घर में दिया या मोमबत्ती जलाई जाती है।

ज्ञान ही आपको मुक्त कर सकता है

ये जानना ज़रूरी है कि हम ये सब क्यों करते हैं और कैसे करते हैं। आवश्यक यह है, कि हम ज्ञान में रहे और तृप्त रहें। केवल ज्ञान ही आपको मुक्त कर सकता है। किसी भी कर्म से न आज तक कोई मुक्त हुआ है और न ही कभी होगा। जब तक आप जीवित है, अगर आपको ज्ञान मिल जाता है तब आप मुक्त हो जायेंगे। तब आपको अपने पुत्र या पुत्री कि प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी कि वे आपके मृत शरीर को आकर ज्ञान दें।

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