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पाकिस्तान के पास नहीं रहा विकल्प

पाकिस्तान को झूठा और धोखेबाज करार देकर अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान ने यह साफ कर दिया है कि अब वह उसके बहकावे में नहीं आने वाला। पाकिस्तान में मौजूद आतंकवादियों की शरणस्थली को खत्म करने के लिए अब वह दूसरे विकल्पों पर विचार कर रहा है।

बनवारी

नव वर्ष के पहले ही दिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ट्वीट ने पाकिस्तान के सामने कोई विकल्प नहीं छोड़ा है। उसे अमेरिका और आतंकवादियों में से किसी एक को चुनना होगा। अब तक वह जो दोहरा खेल खेलता रहा है उसके लिए उसके पास अब कोई गुंजाइश नहीं रह गई है। उसे उत्तरी वजीरिस्तान में उसके खुफिया और सैनिक प्रतिष्ठान के सहयोग से बनी हुई आतंकवादियों की शरणस्थलियों को खत्म करना होगा या अमेरिका की दुश्मनी के लिए तैयार होना होगा। पिछले सात साल से अमेरिका उस पर इन शरणस्थलियों को समाप्त करने का दबाव बना रहा है, लेकिन पाकिस्तान न अफगानिस्तान के खिलाफ आतंकवादी तंत्र का उपयोग छोड़ने के लिए तैयार है और न भारत के खिलाफ। अभी अमेरिका की चिंता उसकी अफगान नीति को असफल बनाने में लगे तालिबान और हक्कानी आतंकवादी हैं। लेकिन अमेरिका यह भी जानता है कि जिहाद के नाम पर खड़े किए गए सभी आतंकवादी संगठन एक-दूसरे को प्रेरित-पोषित करते रहते हैं। यह संभव नहीं है कि कश्मीर को लक्ष्य बनाकर पाले-पोसे गए आतंकवादी बरकरार रहें और अफगानिस्तान को लक्ष्य बनाकर पाले-पोसे गए आतंकवादी समाप्त हो जाएं। इन सबको पैदा करने वाले देवबंदी मदरसे जब तक पाकिस्तान के सीमा प्रांत में कायम हैं आतंकवाद की जड़ें फलती-फूलती रहेंगी।
पहली जनवरी को सुबह सवा चार बजे किए गए अमेरिकी राष्ट्रपति के ट्वीट में बिना लाग-लपेट के दो वाक्यों में तीन बातें कही गर्ईं। ट्रम्प ने कहा कि अमेरिका ने अपनी बेवकूफी में पिछले 15 वर्ष में पाकिस्तान को 33 अरब डॉलर की सहायता दी है और पाकिस्तान ने अमेरिकी नेताओं को बेवकूफ समझते हुए बदले में उसे झूठ और धोखे के अलावा कुछ नहीं दिया। अमेरिका अफगानिस्तान में जिन आतंकवादियों को निशाना बना रहा है उन्हें पाकिस्तान अपने यहां सुरक्षित शरणस्थलियां प्रदान कर रहा है। इससे अधिक उसने कभी कुछ नहीं किया। यह भाषा अब तक अमेरिका द्वारा बरती जाती रही भाषा से बिल्कुल अलग है जिसमें पाकिस्तान के व्यवहार के प्रति निराशा भर नहीं है। डोनाल्ड ट्रम्प ने इस बार यह नहीं कहा कि पाकिस्तान से उन्हें बेहतर सहयोग की अपेक्षा है। इस ट्वीट में अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपना फैसला सुनाया है कि पाकिस्तान अब अमेरिका को बेवकूफ नहीं बना सकता। उसका व्यवहार शत्रुता से भरा हुआ है। इस ट्वीट के बाद अमेरिकी प्रशासन ने पाकिस्तान को दी जाने वाली वार्षिक सहायता पर रोक लगा दी। पाकिस्तान को इस वर्ष अमेरिका से सैनिक और असैनिक कोई दो अरब डॉलर (127.4 अरब रुपये) के आसपास आर्थिक सहायता मिलनी थी। इसके बाद अमेरिका ने घोषित किया कि वह पाकिस्तान के खिलाफ इसके बाद के अगले कदम उठाने की तैयारी कर रहा है। अमेरिकी कार्रवाई से स्तब्ध पाकिस्तान ने शुरू में अपनी नाराजगी दिखाते हुए कहा कि अमेरिकी उस पर गलत आक्षेप कर रहे हैं। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में उसने अधिक कुर्बानी दी है। अब तक उसके 60 हजार लोग मारे जा चुके हैं। अपने अफगानिस्तान अभियान के दौरान अमेरिका ने उसके हवाई अड्डों और सड़क मार्गों का भरपूर इस्तेमाल किया है। पाकिस्तान ने इस लड़ाई में उसे जो सहयोग दिया है उसके बदले पाकिस्तान को दी गई राशि कौड़ियों के बराबर है। अगर अमेरिका किसी स्वतंत्र अमेरिकी एजेंसी से ही दिए गए पैसे का आॅडिट करवाए तो पाकिस्तान का ही उस पर काफी बकाया निकलेगा। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने घोषित किया कि उनका देश अमेरिकी सहायता पर निर्भर नहीं है। नवाज शरीफ ने अपनी पार्टी के प्रधानमंत्री को निर्देश दिया कि वे अमेरिकी सहायता के बारे में भूल जाएं।
पाकिस्तान और चीन दोनों की ओर से यह संकेत दिया गया कि अमेरिका के हाथ खींचने का परिणाम यह होगा कि पाकिस्तान और चीन एक-दूसरे के और निकट आ जाएंगे। चीन पाकिस्तान के लिए अमेरिका का विकल्प बनने को तैयार है। लेकिन जल्दी ही पाकिस्तान को समझ में आ गया कि अमेरिका केवल पाकिस्तान की मदद रोकने तक सीमित नहीं रहेगा। अभी भी अमेरिका संसार की सबसे बड़ी शक्ति है। उससे दुश्मनी मोल लेना आसान नहीं है। सात जनवरी को अपनी विदेश नीति संबंधी एक भाषण में पाकिस्तान की विदेश सचिव तहमीना जंजुआ ने कहा, ‘दोनों तरफ के आरोप-प्रत्यारोप के बावजूद पाकिस्तान अमेरिका से अपने संबंध सुधारने की कोशिश में लगा हुआ है। अमेरिका एक विश्व शक्ति है और उसकी उपस्थिति हमारे क्षेत्र में इतनी अधिक है कि पाकिस्तान को वह पड़ोसी जैसा महसूस होता है। चीन के शक्तिशाली होने से कुछ समस्याएं पैदा हुई हैं। पाकिस्तान अनुभव करता है कि अफगानिस्तान में अमेरिका और भारत का गठजोड़ हो गया है। पाकिस्तान इन सब परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं कर सकता। इसलिए अमेरिकी आक्षेपों के बावजूद वह उसे अपनी बात समझाने की कोशिश करता रहेगा।’ पाकिस्तानी विदेश सचिव ने अपने इस भाषण में अलबत्ता यह स्पष्ट नहीं किया कि आतंकवादियों के बारे में पाकिस्तान अपना रवैया बदलने के लिए तैयार है या नहीं। अफगानिस्तान में अमेरिका और भारत के गठजोड़ की शिकायत का अर्थ यही निकलता है कि पाकिस्तान अफगानिस्तान पर दबाव बनाने के लिए आतंकवादियों का उपयोग करना नहीं छोड़ेगा क्योंकि यह भारतीय राजनय के सामने उसकी पराजय होगी।
पाकिस्तान को अभी भी यही लगता है कि अमेरिकी नीति में हुआ यह परिवर्तन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की सनक का परिणाम है। पाकिस्तान के शासकों को अभी भी यह समझ में नहीं आया कि अमेरिकी नीति में परिवर्तन ट्रम्प की सनक के कारण नहीं अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान के बदले हुए आकलन के कारण हुआ है। उसे अब यह निश्चय हो गया है कि पाकिस्तान पर भरोसा नहीं किया जा सकता। अब तक की पूरी अवधि में पाकिस्तान उसे धोखा देते हुए शत्रुवत व्यवहार करता रहा है। अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान में यह अहसास 2011 में पनपा था जब उन्हें ओसामा बिन लादेन की पाकिस्तान में शरणस्थली का पता लगा था। अमेरिका को पाकिस्तान की सीमाओं का अतिक्रमण करके ओसामा बिन लादेन की हत्या करने में जरा भी देर नहीं लगी। पाकिस्तान उसके बाद भी अपने यहां ओसामा बिन लादेन को आश्रय देने के निर्णय पर पछतावा दिखाने की बजाय अमेरिका पर अपनी संप्रभुता का उल्लंघन करने का आरोप लगाता रहा। उसके शहरों में अमेरिका विरोधी जुलूस निकाले जाते रहे और उसका पूरा राजनीतिक तंत्र अमेरिका के खिलाफ भावनाएं भड़काता रहा। पाकिस्तान ने कुछ समय तक अमेरिकी सेना को अफगानिस्तान में सामग्री भेजने के लिए अपने मार्गों का इस्तेमाल करने तक से रोक दिया। अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान में इसके बाद पाकिस्तान विरोधी भावनाएं पनपनी शुरू हुर्इं। 2011 में पाकिस्तान को 3.5 अरब डॉलर की मदद दी गई थी। यह 2016 में घटकर एक अरब से भी कम रह गई।
अमेरिका अफगानिस्तान में फंसा हुआ है। अब तक वह अफगानिस्तान छोड़ने तक किसी तरह पाकिस्तान को साधे रखने की कोशिश करता रहा। लेकिन जब यह निर्णय कर लिया गया कि बिना आतंकवादी तंत्र को समाप्त किए अमेरिका के लिए अफगानिस्तान से निकलना मूर्खता होगी तो उसने पाकिस्तान के बारे में फिर से आकलन किया। अमेरिका की आशंका यह है कि अफगानिस्तान में जो अशासित या अल्पशासित इलाके हैं वे जिहादियों की शरणस्थली बने रहते हैं। जब उन पर दबाव पड़ता है तो वे पाकिस्तान की शरणस्थलियों में भाग जाते हैं। अगर इन सभी शरणस्थलियों को समाप्त किए बिना अमेरिका अफगानिस्तान से निकल जाता है तो अलकायदा और उन जैसे आतंकवादी संगठनों को फिर से पनपने का मौका मिल जाएगा। वे अफगानिस्तान के इन अशासित क्षेत्रों में पैर जमा लेंगे और अमेरिका पर 9 सितंबर, 2001 जैसे आक्रमण का खतरा पैदा हो जाएगा। इस आकलन के बाद फिर पाकिस्तान पर दबाव बढ़ाया गया।
डोनाल्ड ट्रम्प खाटी अमेरिकी हैं और वे बराक ओबामा जितना धीरज नहीं दिखा सकते थे। इसलिए अमेरिका ने यह तय कर लिया कि पाकिस्तान को और ढील देने की आवश्यकता नहीं है। पाकिस्तान को यह स्पष्ट कर दिया जाना चाहिए कि अमेरिका का उससे विश्वास उठ चुका है। अब अमेरिका आतंकवादी तंत्र को समाप्त करने के लिए दूसरे विकल्पों पर विचार करने के लिए तैयार है। उसकी निगाह में अब पाकिस्तान की वही स्थिति हो चली है जो उदाहरण के लिए ईरान की है। बल्कि अभी तक उसने ईरान की सीमाओं का उल्लंघन नहीं किया, केवल उसकी आर्थिक नाकेबंदी की है। पाकिस्तान की आतंकवादियों की शरणस्थलियों को समाप्त करने के लिए अमेरिका पाकिस्तान की सीमाओं का उल्लंघन करते हुए सैनिक कार्रवाई भी कर सकता है।
पाकिस्तान की समस्या यह है कि वह आतंकवाद के मुद्दे पर चीन और रूस से भी बहुत आशाएं नहीं पाल सकता। चीन उईगर आतंकवादियों से कम परेशान नहीं है। वह उनको नियंत्रित करने में पाकिस्तान के सहयोग की आशा करता रहा है। लेकिन पाकिस्तान का आतंकवादी तंत्र चीनी कम्युनिस्ट शासकों की बजाय उईगर मुसलमानों को ही अपना आत्मीय मानता है। इसलिए उन्हें पाकिस्तान के आतंकवादी तंत्र से यथासंभव सहायता मिलती रहती है। चीन को अपने आर्थिक कॉरिडोर के लिए भी पाकिस्तान के आतंकवादी एक बड़ी समस्या दिखाई देते हैं। उनकी वजह से उसका साठ अरब डॉलर का निवेश कभी भी खटाई में पड़ सकता है। पाकिस्तानी सेना ने चीन को इस कॉरिडोर की आतंकवादियों से रक्षा करने का भरोसा अवश्य दिलाया है लेकिन चीन जानता है कि आतंकवादियों पर अभी किसी का नियंत्रण नहीं है। पिछले दिनों उसने अफगानिस्तान को इस परियोजना में शामिल करने का प्रस्ताव रखा था लेकिन अफगानिस्तान का पाकिस्तान पर भरोसा और पहले समाप्त हो चुका है। इसलिए अभी तक इस दिशा में बात आगे नहीं बढ़ पाई।
रूस भी मध्य एशिया में मुस्लिम आतंकवादियों की समस्या से उलझता रहा है। मध्य एशिया से उनकी पैठ रूसी क्षेत्रों में भी हो गई है। भारत और ईरान के साथ मिलकर वह जो उत्तर-दक्षिण कॉरिडोर बना रहा है उस पर भी जिहादी संगठनों की कुटिल दृष्टि बनी रहती है। इस सबके कारण रूस भी आतंकवादियों को और पनपने नहीं देना चाहेगा। इन सब कारणों से चीन और रूस का पाकिस्तान को कितना सहयोग मिल पाएगा, कहना मुश्किल है। अगर अमेरिका आतंकवादी अड्डों को समाप्त करने के लिए सैनिक कार्रवाई करता है तो सिवाय अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हल्ला मचाने के चीन और रूस पाकिस्तान की कोई सहायता नहीं करने वाले।
पाकिस्तान की दूसरी समस्या यह है कि अगर वह अपने सीमावर्ती क्षेत्रों की आतंकवादी शरणस्थलियों को समाप्त करने के लिए राजी भी हो जाता है तो उसका उपयोग करने के बाद अमेरिका उसे छोड़ने ही वाला है। अमेरिका के लिए पाकिस्तान का उपयोग समाप्त हो चुका है। अमेरिका यह तथ्य नजरअंदाज नहीं कर सकता कि चीन से पाकिस्तान के बहुत प्रगाढ़ संबंध हो गए हैं। इस पूरे क्षेत्र में वह चीन को अपना प्रतिद्वंद्वी ही मानता है। उसने भारत से अपनी निकटता बढ़ाने का निर्णय भी इसी आधार पर लिया है कि एक महाशक्ति के रूप में भारत का उदय चीन के विस्तार को रोक सकेगा। रूस के लिए भी इसी कारण भारत का महत्व अधिक है। अब तक पाकिस्तान इस गलतफहमी में रहा है कि वह अपनी भौगोलिक परिस्थिति के कारण अमेरिका को सहयोग करने के लिए मजबूर कर सकता है। लेकिन महाशक्तियां कभी ऐसी किसी विवशता को बर्दाश्त नहीं करतीं। अमेरिका ने अब तक पाकिस्तान को अपना दरबारी समझकर ही उसका उपयोग किया है। पाकिस्तान ने अमेरिकी सहायता पर निर्भरता बनाकर स्वयं अपनी इज्जत गिराई है। उसे यह समझ में आ जाना चाहिए कि अमेरिका का विश्वास खोने का मतलब है उससे शत्रुता। पाकिस्तान का नाभिकीय शक्ति से संपन्न होना अमेरिका के लिए अधिक महत्वपूर्ण नहीं है। अमेरिका कहीं अधिक आसानी से उसके नाभिकीय प्रतिष्ठान पर नियंत्रण कर सकता है।
अमेरिका ने पाकिस्तान का उपयोग अवश्य किया है लेकिन उस पर पूरी तरह भरोसा कभी नहीं किया। अफगानिस्तान पर सोवियत नियंत्रण के समय 1978-89 के बीच पाकिस्तान और अमेरिका के संबंध प्रगाढ़ रहे, लेकिन सोवियत संघ बिखरते ही अमेरिका के लिए पाकिस्तान का महत्व घट गया। 1990 से 2000 तक पाकिस्तान के नाभिकीय कार्यक्रम को लेकर अमेरिका की भौंहें तनी रहीं और इस अवधि में पाकिस्तान पर आर्थिक प्रतिबंध भी लगाए गए। 2001 में अलकायदा की चुनौती के बाद पाकिस्तान का महत्व फिर बढ़ा। 2002 में उसे गैर-नाटो सहयोगी देश का दर्जा मिला लेकिन 2011 में ओसामा बिन लादेन का पता लगते ही अमेरिका की निगाह फिर बदल गई। कश्मीर के मामले में भी उसने कभी पाकिस्तान का खुलकर पक्ष नहीं लिया। इसलिए पाकिस्तान भारत से अपनी तुलना नहीं कर सकता। अमेरिका के लिए भारत का महत्व हमेशा ही पाकिस्तान से अधिक रहा है। इसके बावजूद कि भारत ने 1971 में सोवियत रूस से मैत्री संधि की थी। आज भारत और अमेरिका में निकटता बढ़ रही है लेकिन यह कोई गठजोड़ नहीं है जैसा कि पाकिस्तान ने आरोप लगाया है। आतंकवाद के मामले में पाकिस्तान के विकल्प अब समाप्तप्राय हैं। उसे सऊदी अरब से भी किसी समर्थन की आशा नहीं करनी चाहिए क्योंकि सऊदी अरब भी जिहादी तत्वों से अपना संबंध समाप्त करने की कोशिश कर रहा है। भारत से पाकिस्तान सामरिक बराबरी की आशा तो बहुत पहले 1971 में ही छोड़ चुका था। अब जिहादी तंत्र का इस्तेमाल करते रहना भी उसके लिए दूभर होने वाला है। अफगानिस्तान के मजबूत होने का मतलब है पाकिस्तान की पठान समस्या का फिर से जटिल हो जाना। इससे आगे जाकर कभी पाकिस्तान के फिर से विभाजन की नौबत आ सकती है। 

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