परिवारवाद के पसरते पांव

प्रदीप सिंह।

लालू प्रसाद यादव के परिवार में घमासान मचा हुआ है। पूरे मामले का लब्बोलुआब यह कि बेटे बेटियों में चल रहे राजनीतिक विरासत के युद्ध में अब बहूरानी भी कूद गई हैं। लालू के बड़े बेटे तेज प्रताप की पत्नी ऐश्वर्या बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री दरोगा राय की पोती और राष्ट्रीय जनता दल के वरिष्ठ नेता की पुत्री हैं। जाहिर है कि राजनीति उनके लिए कोई नई चीज नहीं है। उधर मुलायम सिंह यादव के परिवार में पड़ी फूट पार्टी की फूट बन गई है। चुनाव पंचायत का हो, स्थानीय निकाय, विधानसभा या लोकसभा का। हर चुनाव में राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते परिवार टूटते नजर आते हैं। जो बरसों बरस हम प्याला हम निवाला रहे वे चुनाव में एक दूसरे के विरोध में खड़े नजर आते हैं। इस रोग से कोई राजनीतिक दल अछूता नहीं है। बल्कि कहें कि कम ही राजनीतिक परिवार अछूते हैं। राजनीति में परिवारवाद और परिवार की राजनीति के समर्थन में एक तर्क दिया जाता है कि क्या किसी नेता के परिवार के लोगों को राजनीति में आने का हक नहीं है। उनके इस मौलिक अधिकार को आप कैसे छीन सकते हैं। जब डॉक्टर का बेटा डॉक्टर, वकील का बेटा वकील और जज का बेटा जज बन सकता है तो नेता का बेटा नेता क्यों नहीं। ऐसा तर्क देने वाले यह भूल जाते हैं कि डॉक्टर, वकील और जज अपने पिता की वजह से कम और योग्यता के कारण ज्यादा बनते हैं। आखिरी तर्क होता है कि ठीक है नेता का बेटा नेता तभी बनेगा जब उसे लोगों का समर्थन मिलेगा। उसे कम से कम अवसर तो देना चाहिए।

इसका दूसरा पहलू यह है कि नेता का झोला झंडा उठाने और दरी बिछाने वाले कार्यकर्ता की बारी आती है तो नेता को अपने परिवार के लोग ही क्यों दिखते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि कोई कार्यकर्ता नेता के लिए क्यों काम करे। एक समय था जब पार्टियों से कार्यकर्ता वैचारिक प्रतिबद्धता के कारण जुड़ते थे। पद और सत्ता की आकांक्षा के बिना निष्काम भाव से काम करते थे। ज्यादातर पार्टियों में अब सत्ता ही सबसे बड़ी विचारधारा बन गई है। वह जमाना चला गया जब व्यक्तिगत हित पर दल के हित और दलगत हित पर देश हित को तरजीह दी जाती थी। अब अपना हित ही एक मात्र लक्ष्य है। इसके लिए दल छोड़ना पड़े या परिवार तोड़ना पड़े। छत्तीसगढ़ में हाल ही में एक कांग्रेस नेता अपने विधानसभा क्षेत्र में प्रचार के लिए निकले तो किसी ने उनकी पार्टी के बारे में सवाल किया। उन्होंने बिना देर किए जवाब दिया कि पार्टी गई तेल लेने आप तो हमारा खयाल रखिए। ऐसा नहीं है कि ऐसा कहने या मानने वाले वे अकेले व्यक्ति या कांग्रेस अकेली पार्टी है।
कांग्रेस पार्टी के विरोधी कहते हैं कि राजनीति में परिवारवाद और वंशवाद की शुरुआत नेहरू परिवार ने की। मोती लाल नेहरू ने जवाहर लाल नेहरू को कांग्रेस अध्यक्ष बनवाने के लिए क्या क्या किया यह इतिहास के पन्नों में दर्ज है। जवाहर लाल नेहरू ने प्रधानमंत्री रहते हुए अपनी बेटी इंदिरा गांधी को पार्टी का अध्यक्ष बनवा दिया। इस सिलसिले में एक अलग तरह का वाकया याद आता है। बात साल 2004 की है। लोकसभा के चुनाव होने वाले थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को लगा कि समाजवादी नेता और पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के बड़े बेटे पंकज को उत्तर प्रदेश के मऊ लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ाना चाहिए। उनका मानना था कि चंद्रशेखर खुद कभी यह बात कहेंगे नहीं। वाजपेयी ने जार्ज फर्नांडीज, यशवंत सिन्हा और राजनाथ सिंह को बुलवाया और कहा कि चंद्रशेखर जी से बात कीजिए। यह भी कहा कि हो सकता है उन्हें भाजपा के चुनाव चिन्ह पर बेटे को लड़ाने पर एतराज हो। तो मऊ सीट भाजपा समता पार्टी (जार्ज साहब उस समय उसी पार्टी में थे) को दे देगी। जार्ज ने जाने से मना कर दिया। कहा कि उन्हें पता है जवाब क्या होगा। बाकी दोनों नेता गए। चंद्रशेखर जी ने प्रस्ताव सुना कहा बहुत अच्छा सुझाव है। पर मेरा एक सुझाव है कि उसे मऊ की बजाय बलिया (चंद्रशेखर का संसदीय क्षेत्र) से खड़ा कीजिए। दोनों नेता खुश हो गए। पर आगे की बात सुनकर दोनों सन्नाटे में आ गए। चंद्रशेखर ने कहा कि मैंने जब राजनीति में आने का फैसला किया तो अपने परिवार के सब लोगों को बुलाकर पूछा था कि कोई और राजनीति में जाना चाहता हो तो मैं पीछे हट जाऊं। यदि नहीं तो जब तक मैं राजनीति में रहूंगा मेरे परिवार से कोई और राजनीति में नहीं जाएगा। इसलिए आप लोग पंकज को लड़ाइए मैं चुनाव नहीं लड़ूंगा। आज ऐसी बातें किताबी लग सकती हैं।

नाटक में जैसे परदा गिरने के बाद जब फिर उठता है तो एक नया दृश्य सामने होता है। वैसे ही इस पूरे वाकए पर परदा गिराने के बाद अब आज के समय का नया दृश्य देखिए।
देश के लगभग सभी राजनीतिक दलों में नेताओं के परिवार के लोग राजनीति में सक्रिय रहते हैं या सक्रिय होने की आकांक्षा रखते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के टिकट बंटवारे की बैठक में कहा कि जिन्हें अपने परिवार के लोगों को टिकट दिलाना हो वे चुनावी राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा कर दें। पर कुछ ही दिन बाद उन्हें मध्य प्रदेश में ही इस नियम से समझौता करना पड़ा। मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के राज में इस पर कुछ अंकुश तो लगा है पर पूरी तरह नहीं। एक परिवार से एक ही व्यक्ति राजनीति में होगा इस फार्मूले के अपवादों की संख्या बढ़ती जा रही है। ऐसे में पार्टी के सामने आने वाले दिनों में एक नई समस्या आने वाली है। भाजपा में एक नई नारी शक्ति का उदय हो रहा है। यों तो मुख्यमंत्रियों की पत्नियों की राजनीतिक और प्रशासनिक दखलअंदाजी के किस्से पहले भी सुने जाते रहे हैं। पर यह मामला थोड़ा अलग है। भाजपा के तीन मुख्यमंत्रियों की पत्नियों की सक्रियता और राजनीतिक महत्वाकांक्षा की खबरों ने पार्टी नेतृत्व को चौकन्ना कर दिया है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पत्नी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा किसी से छिपी नहीं है। कुछ साल पहले शिवराज सिंह चौहान उन्हें चुनाव भी लड़वाना चाहते थे। लेकिन पार्टी तैयार नहीं हुई। इसी तरह हाल ही में हिमाचल के मुख्यमंत्री बने जयराम ठाकुर की पत्नी साधना ठाकुर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में रह चुकी हैं। मुख्यमंत्री पर उनके प्रभाव की चर्चा हिमाचल में आजकल खूब हो रही है। जयराम ठाकुर से उनकी मुलाकात वहीं हुई थी। इसी तरह महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़णनवीस की पत्नी अमृता सार्वजनिक समारोहों, खासकर बॉलीवुड से जुड़े कार्यक्रमों में अपनी उपस्थिति से अक्सर चर्चा में रहती हैं। तीनों का ही अपने अपने पति के राज्य की नौकरशाही पर भी प्रभाव है। यह ऐसी पार्टी में हो रहा है जहां सामान्य कार्यकर्ता प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री और पार्टी अध्यक्ष के पद तक पहुंचता है।

आज कहना कठिन है कि क्या इनमें से कोई भविष्य की राबड़ी देवी हैं। पर यह प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। जरा उस दिन की कल्पना कीजिए जब बड़े सरकारी और राजनीतिक पद नेताओं के परिवार वालों के लिए आरक्षित हो जाएंगे। जनतंत्र के स्वास्थ्य के लिए जरूरी है कि इस प्रवृत्ति पर रोक लगे। इसके लिए मतदाता को भी जागरूक होना पड़ेगा। 

×