टकराव में रिसती कड़वाहट

विजय माथुर
Sun, 10 Mar, 2019 15:10 PM IST

सत्ता और सियासत के बीच छिडऩे वाली जंग कभी खत्म नहीं होती. गाहे-बगाहे टीस सांकेतिक रूप से उफनती रहती है और नाजुक मौकों पर पार्टी को डुबोने का काम करती है. यह समझने के बजाय समझाने के सियासी स्वाइन फ्लू से न तो कांग्रेस बची हुई है और न भाजपा.

16विजयश्री के बाद गहलोत की ताजपोशी भी अवसरवाद से बचते-बचाते और भविष्य के अंदेशों का अक्स भांपते हुए की गई कि आने वाले बेढब वक्त में गवर्नेंस की बड़ी चुनौतियों से निपटने में गहलोत ही ज्यादा सक्षम होंगे. लेकिन, ताजपोशी की तड़प संजोए सचिन पायलट के दिल बदल की कोशिशें सतही कामयाब होती नजर आईं. वक्त का तकाजा देखते हुए यह संतोष का नुमाइशी चेहरा ही साबित हुआ. सूत्रों के मुताबिक, चाहत की चिंगारी नसीहतों की नर्म राख में दब जरूर गई, लेकिन बुझी नहीं. पिछले दिनों दिल्ली में एक वरिष्ठ पार्टी नेता द्वारा आयोजित भोज में यह कसक फूट ही पड़ी कि इस जंग को आप चाहे जिस नजरिये से देखें, लेकिन हमने अपने कदम कहां पीछे हटाए? बल्कि हमारे कद में कितना इजाफा हुआ, बताने की जरूरत नहीं है. विश्लेषकों का कहना है कि यह इंद्रधनुषी मंसूबे समेटे एक राजनेता की पटकथा है, जो अभी भी बेचैनियों में धंसी हुई है.

पायलट की परेशानी

सचिन पायलट का क्षोभ गहलोत द्वारा अपने बेटे वैभव को लोकसभा  चुनाव में उतारे जाने को लेकर भी है. हालांकि, पायलट कोई कुतर्क नहीं करते, लेकिन उनकी खलिश इन शब्दों के साथ काफी कुछ कह देती है, मेरे परिवार का कोई सदस्य लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेगा. इस तरह की जहरबुझी तीरंदाजी से अटकलें जिस तरह जोर पकड़ रही हैं, वे पार्टी को पंचर किए बिना नहीं छोड़ेगी. फिलहाल कार्यकर्ताओं की मंशा है कि वैभव को जोधपुर संसदीय क्षेत्र से चुनाव मैदान में उतारा जाना चाहिए. सूत्रों के मुताबिक, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत वैभव को टोंक-सवाई माधोपुर संसदीय क्षेत्र से चुनाव मैदान में उतारना चाहेंगे? टोंक सचिन पायलट का निर्वाचन क्षेत्र है. विश्लेषकों का कहना है कि मौकों पर हुनर दिखाने में माहिर गहलोत ऐसा करके बेसिर-पैर की उम्मीदें भोंथरा करने का मौका नहीं छोड़ेंगे. बहरहाल, प्रदेश और केंद्रीय नेतृत्व ने अभी इस मामले में अपने पत्ते नहीं खोले हैं. इस मुद्दे पर कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव एवं प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडेय भी खुलकर बोलने से बच रहे हैं. अलबत्ता उनका कहना है कि बड़े नेताओं के बेटे हों या कोई और दावेदार, कांग्रेस में एक प्रक्रिया है, उसके तहत ही नाम फाइनल होता है. नाम का प्रस्ताव छानबीन समिति द्वारा केंद्रीय चुनाव समिति के समक्ष रखा जाता है, जिस पर चर्चा के बाद उम्मीदवार तय किए जाते हैं. लेकिन, जब पांडेय कहते हैं कि नए और युवा चेहरे मैदान में उतारने की तैयारी की जा रही है और इस पर होमवर्क चल रहा है, तो असमंजस की परतें गाढ़ी होने लगती हैं. एक ओर वह कहते हैं, पराजित उम्मीदवारों को आजमाने का दांव नहीं खेला जाएगा, वहीं दूसरी ओर उनका कहना है, मेरिट के आधार पर एक-दो मामले अपवाद भी हो सकते हैं… प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते टिकट बंटवारे में पायलट की उम्मीदों की हरारत कम नहीं हुई है, लेकिन इस मामले में उनका अतीत आड़े आता है. विधानसभा चुनाव में उन्होंने जिन 27 उम्मीदवारों पर दांव खेला था, उनमें सिर्फ पांच ही जीत पाए थे. इसलिए उनकी कितनी चलेगी, कहने की जरूरत नहीं.

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कांग्रेस की चुनौतियां

एयरो सर्जिकल स्ट्राइक को भुनाने में जुटी भाजपा का दांव खेलने में कांग्रेस भी पीछे नहीं है. समझा जाता है कि कांग्रेस कम से कम चार सीटों पर रिटायर्ड फौजी खड़े कर सकती है, इस तकाजे के साथ कि जिन्हें चुनाव मैदान में उतारा जाए, वे नए हों और राजनीति का नया चेहरा हों. राजस्थान में अब तक के चुनावी ट्रेंड को समझें, तो राज्य की सत्ता पर काबिज पार्टी ही फायदे में रही है. लेकिन, क्या इस रहस्य की गुगली समझे बगैर कि मौजूदा कांग्रेस सरकार में सत्ता के दो केंद्र हैं? अब जबकि चुनावी रणनीति पुरानी सियासत के साथ चलने बनाम नई राजनीति को मौका देने के बीच तय करनी है, तो डेढ़ दर्जन सीटों पर जातिगत समीकरण साधना कितना मुश्किल होगा? यह पहेली सुलझाने में पायलट पर भरोसा नहीं किया जा सकता. कांग्रेस के पास इन सीटों पर अभी कोई सांसद भी नहीं है. लिहाजा, उसके लिए तो बेशुमार परेशानियां हैं. कांग्रेस इन सीटों पर कोई नया प्रयोग दोहराए, तो भले बात बन सकती है, जो गहलोत के बूते ही संभव है.

राह का रोड़ा बनीं राजे

भाजपा की चुनावी रणनीति का सबसे उलझा पहलू है वसुंधरा राजे के आगे मोदी-शाह की विवशता. बीती 10 फरवरी को झालावाड़ में कार्यकर्ताओं के बीच वसुंधरा राजे का संबोधन देखिए, भले ही मुझे पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया गया है, लेकिन राज्य को छोडक़र मैं कहीं नहीं जाने वाली. विश्लेषकों का कहना है कि पार्टी नेतृत्व वसुंधरा राजे को सूबाई सियासत की सरहदों से दूर करने की जितनी कोशिश कर रहा है, राजे उतने ही दमखम के साथ अपनी ताकत में इजाफा करती जा रही हैं. पार्टी पर राजे की बढ़ती पकड़ यह साबित करती है कि राजनीतिक दूरदर्शिता के मामले में राजे उतनी दरिद्र नहीं, जितना पार्टी नेतृत्व सोचे बैठा है. राजे ने इस मामले में असहमति और अभिव्यक्ति के अपने अधिकार का चाबुक तो चला ही दिया. मतलब साफ है कि भाजपा नेतृत्व राजे का जिस तरह इस्तेमाल करना चाहता है, वह संभव नहीं है.

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भाजपा नेतृत्व और वसुंधरा राजे के बीच टकराव की सरहदें यहीं खत्म नहीं होतीं, बल्कि एक दर्जन सांसदों का टिकट काटे जाने का तर्क भी राजे को हजम नहीं हो रहा. बीते दिनों भाजपा ने आरएसएस के साथ सांसदों की लोकप्रियता परखने के लिए मिशन-25 के तहत एक आंतरिक सर्वे कराया था, जिसकी रिपोर्ट के मुताबिक, एक दर्जन सांसद कसौटी पर खरे नहीं पाए गए. अब जबकि भाजपा नेतृत्व उक्त सांसदों का टिकट काटने का मन बनाए हुए है, तो वसुंधरा राजे सियासी पैंतरेबाजी पर उतारू हैं. राजे ने दिल्ली में पार्टी के संगठन महासचिव राम लाल से मिलकर अपनी नाराजगी जता दी है. उन्होंने इस बाबत राजे को पार्टी अध्यक्ष अमित शाह से मिलने का मशविरा दिया है. लेकिन शाह हैं कि वसुंधरा से मिलने को तैयार नहीं हैं. भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व से राजे के टकराव की दो और भी बड़ी वजहें हैं. पहली, वसुंधरा राजे जयपुर राज परिवार की सदस्य दीया कुमारी को टोंक-सवाई माधोपुर या जयपुर संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ाना चाहती हैं. दूसरी, कोटा-बंूदी संसदीय क्षेत्र से वह कोटा राज परिवार के इज्यराज सिंह को चुनाव लड़ाने की ठाने हुए हैं. इज्यराज सिंह विधानसभा चुनाव के दौरान पाला बदल कर कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए थे. राजे ने लाडपुरा विधानसभा क्षेत्र से जीत की तिकड़ी बना चुके भवानी सिंह राजावत को दरकिनार करके इज्यराज सिंह की पत्नी कल्पना सिंह को उम्मीदवार बनाया था. राजे खुशनसीब रहीं कि कल्पना सिंह ने जीत हासिल की. राजे ने दल बदल का यह दांव इज्यराज से इस वादे के साथ खेला था कि उन्हें लोकसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार बनाया जाएगा. लेकिन, सवाल यह है कि कोटा-बूंदी संसदीय क्षेत्र से लगातार जीत की इबारत दर्ज करते आए ओम बिरला को कैसे दरकिनार किया जा सकता है? बिरला पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के सबसे भरोसेमंद सांसदों में गिने जाते हैं. इज्यराज सिंह की हिमायत में वसुंधरा राजे की हठधर्मी क्या गुल खिलाएगी?

विश्लेषक कहते हैं कि प्रदेश भाजपा में अपनी धमक जमाए राजे किसी भी स्तर पर जा सकती हैं. राजे का दुराग्रह कांग्रेस के लिए मुफीद साबित हो सकता है. नतीजतन, पुत्रवधु एकता धारीवाल को चुनाव लड़ाने से इंकार करते रहे नगरीय विकास मंत्री शांति धारीवाल पार्टी हित में अपनी बात से फिर सकते हैं. राजे की मनमानी की दहलीज पर बिरला और राजावत की नाराजगी एकता धारीवाल की जीत को सौ प्रतिशत सुनिश्चित कर सकती है, यह साफ नजर आ रहा है.

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