जातीय समीकरण करेंगे जीत-हार का फैसला

राजेश मंझवेकर
Sat, 16 Mar, 2019 12:45 PM IST

नवादा लोकसभा क्षेत्र का इतिहास बताता है कि यहां जाति के भरोसे ही चुनाव लड़े जाते रहे हैं. शुरुआत से लेकर आज तक के परिदृश्य की बात करें, तो कोई बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है. विकास समेत विभिन्न मुद्दे हमेशा से हाशिये पर चले जाते रहे हैं और अंतत: जातीय फैक्टर ही प्रभावी बन जाता है. चूंकि यहां का गणित बहुत स्पष्ट है, इसलिए उम्मीदवार भी बहती गंगा में हाथ धोने से नहीं चूकते. इसका लाभ हमेशा उम्मीदवारों को मिला है, इसलिए सभी इसी अमोघ अस्त्र के भरोसे चुनावी महासमर में कूद पड़ते हैं. नवादा सीट पर भूमिहारों एवं यादवों के 30-30 प्रतिशत वोट हमेशा से चुनाव परिणाम को दिशा देने वाले रहे हैं. हालांकि, इस परिणाम को इधर-उधर कर डालने में हर बार प्रभावी साबित हुए पिछड़े और दलित वर्ग के 10-10 प्रतिशत वोट भी बहुत महत्व के हैं. इसके अलावा मुस्लिमों के पांच और अन्य पांच प्रतिशत मिश्रित वोट तोड़-फोड़ कर अपने लिए साजगार बनाने की जिसने सफल कोशिश कर ली, नवादा में उसके सिर पर ही ताज सुशोभित होता रहा है. ताजा आंकड़ों के मुताबिक, नवादा में कुल 16 लाख 56 हजार 152 मतदाता हैं, जिनमें पुरुषों की संख्या आठ लाख 63 हजार 936 और महिलाओं की संख्या सात लाख 92 हजार 133 है. यहां 83 मतदाता थर्ड जेंडर के भी हैं. मतदाता सूची में लिंगानुपात 9:17 है, जबकि जिले की जनसंख्या के हिसाब से लिंगानुपात 9:39 है. निर्वाचन शाखा की सूचना के मुताबिक, इस बार मतदाताओं की संख्या घटी है. ऐसा इस साल मतदाता सूची के पुनरीक्षण कार्यक्रम के दौरान डुप्लीकेट और मृत मतदाताओं के नाम विलोपित किए जाने के कारण हुआ. हालांकि, नवादा में अधिकतम 60-65 प्रतिशत मतदाता ही उम्मीदवारों के भाग्य विधाता बन पाते हैं.

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2011 की जनगणना के मुताबिक, नवादा की आबादी 22 लाख 26 हजार 653 है. इस संसदीय सीट के अंर्तगत छह विधानसभा क्षेत्र आते हैं, जिनमें नवादा जिले के नवादा, हिसुआ, रजौली (सुरक्षित), गोविंदपुर एवं वारिसलीगंज और शेखपुरा जिले का बरबीघा विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं. बरबीघा में भी भूमिहारों और यादवों की बहुलता है. 2009 के परिसीमन से पहले नवादा संसदीय क्षेत्र में गया जिले का अतरी विधानसभा क्षेत्र भी शामिल था. 1957 से पहले नवादा गया पूर्वी संसदीय सीट का हिस्सा था. 1957 में नए परिसीमन के तहत संसदीय क्षेत्र संख्या 34 के रूप में नवादा लोकसभा क्षेत्र का गठन हुआ. जिले के हिसुआ प्रखंड स्थित मंझवे निवासी सत्यभामा देवी एवं रामधनी दास संयुक्त रूप से पहले सांसद निर्वाचित हुए. दोनों कांग्रेस के सिपाही थे. 1962 में यह बदल कर संसदीय क्षेत्र संख्या 42 (सुरक्षित) हो गया. रामधनी दास इस चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के टिकट पर सांसद चुने गए. एमएसपीएन पुरी ने निर्दलीय के रूप में 1967, सुखदेव प्रसाद वर्मा ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के टिकट पर 1971, सूर्य नारायण सिंह ने भारतीय लोकदल के टिकट पर 1977, कुंवर राम ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के टिकट पर 1980 एवं 1984, प्रेम प्रदीप ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी माक्र्सवादी के टिकट पर 1989 और प्रेमचंद राम ने भी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी माक्र्सवादी के टिकट पर 1991 में जीत दर्ज की थी. कामेश्वर पासवान ने भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर 1996, मालती देवी ने राष्ट्रीय जनता दल के टिकट पर 1998, संजय पासवान ने भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर 1999, वीरचंद्र पासवान ने राष्ट्रीय जनता दल के टिकट पर 2004 में जीत का परचम लहराया. 2009 के परिसीमन में यह संसदीय क्षेत्र संख्या 39 हो गया और इसे सामान्य सीट में बदल दिया गया. 2009 में डॉ. भोला सिंह ने भाजपा के टिकट पर जीत दर्ज की थी. उनके बाद 2014 में भाजपा के ही गिरिराज सिंह ने इस सीट पर कब्जा जमाया.

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लंबे समय तक जारी जातीय हिंसा के दौर से बाहर निकलने में सफल रहे नवादा लोकसभा क्षेत्र को नक्सलवाद का भी सामना करना पड़ता है. इन दिनों नक्सलवाद थोड़ा कमजोर पड़ा है, लेकिन उसका अस्तित्व मिटा नहीं है. सवर्ण वोटों की संख्या के आधार पर दिग्गज भूमिहार उम्मीदवारों की नजर इस सीट पर लगी रहती है. 2009 में परिसीमन के बाद सामान्य सीट घोषित होने पर भाजपा-जदयू गठबंधन ने नवादा में भूमिहारों के लिए दरवाजा खोला था. वर्तमान में नवादा में राजनीतिक रूप से अहम भूमिका निभाने वाली दो बड़ी जातियों के नेता-कार्यकर्ता गोलबंदी में जुट गए हैं. कांग्रेस अर्से से इस सीट से दूर रही है. हालांकि, तीन राज्यों में आए उत्साहजनक परिणामों के चलते वह भी इस सीट के लिए अपने पर तौलती दिख रही है. राजद जैसे उसके सहयोगी के हौसले भी सातवें आसमान पर हैं. कहने की जरूरत नहीं कि दोनों प्रमुख जातियों का दखल इन सभी दलों में दिख रहा है. चुनावी माहौल में अधिकतर लोगों की चर्चा का विषय यह होता है कि विकास ही चुनाव का नतीजा तय करेगा. लेकिन, नवादा का मिजाज भांपते हुए अंतत: सभी इसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि इस बार भी जातीय फैक्टर अहम रोल निभाएगा.

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