एक और शिखर वार्ता

बनवारी

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से चीन के वुहान शहर में अनौपचारिक शिखर वार्ता के तीन सप्ताह बाद रूस के राष्ट्रपति पुतिन के निमंत्रण पर वैसी ही अनौपचारिक शिखर वार्ता के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रूस के सोची शहर गए। रूस के इस रमणीय तटवर्ती शहर में बोचरेव क्रीक में दोनों नेताओं ने 21 मई को दिनभर में छह घंटे साथ-साथ बिताए। इस अवधि में उनके बीच एकांत वार्ता हुई, बाद में प्रतिनिधिमंडल स्तर पर भी बात हुई, नौकाविहार हुआ और राष्ट्रपति पुतिन नरेंद्र मोदी को एक शैक्षिक संस्थान दिखाने ले गए। यह शिखर वार्ता अनौपचारिक अवश्य थी, लेकिन यह अवसर महत्वपूर्ण था और दोनों के बीच निश्चय ही विभिन्न विषयों और समस्याओं पर गंभीर बात हुई होगी। वार्ता के बाद दोनों देशों की ओर से जो संक्षिप्त वक्तव्य प्रसारित हुए, उससे बातचीत के विषय और उपलब्धियों के बारे में अधिक जानकारी नहीं मिलती। लेकिन यह अनुमान लगाया जा सकता है कि दोनों नेताओं के बीच तात्कालिक समस्याओं को लेकर बात हुई। उन्होंने एक-दूसरे को अंतरराष्ट्रीय विषयों पर अपना दृष्टिकोण समझाया। दोनों देशों के सामने आसन्न समस्या अमेरिका द्वारा रूस और ईरान पर लगाए जाने वाले आर्थिक प्रतिबंध हैं, जिनके कारण भारत को इन देशों के साथ अपने आर्थिक और सामरिक संबंध आगे बढ़ाने में समस्या आ सकती है।
अमेरिका पर 11 सितंबर 2001 को हुए आतंकवादी हमले के बाद से अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चुनौती आतंकवादी शक्तियों को समाप्त करना हो गई है। इसी को लेकर पाकिस्तान की मदद से उसने अपने हाथ खींच लिए हैं। अपनी आक्रामक रणनीति के द्वारा उसने सीरिया और इराक में पैर फैलाए बैठे आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट का लगभग सफाया कर दिया है। सऊदी अरब को उसने वहाबी आतंकवादी शक्तियों से अलग कर लिया है। लेकिन मध्य-पूर्व में ईरान समर्थित आतंकवादी संगठनों की चुनौती बढ़ती जा रही है। सीरिया के राष्ट्रपति असद की पीठ पर रूस का भी हाथ है और ईरान का भी। असद से रूस के संबंध कम्युनिस्ट रुझान वाली बाथ पार्टी के दिनों से है और ईरान असद की सत्ता को शिया सत्ता के रूप में देखता है, इसके अलावा यमन और लेबनान में भी ईरान स्थानीय शिया आतंकवादी संगठनों को सब तरह की सहायता देता रहा है। मध्य-पूर्व में सऊदी अरब और ईरान प्रतिस्पर्धी शक्तियां हैं और दोनों एक-दूसरे की जानी दुश्मन बनी हुई हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को शुरू में लगता था कि मध्य-पूर्व को आतंकवादी शक्तियों से मुक्त करने में रूस उनकी मदद कर सकता है। इस्लामिक स्टेट ने अपने तंत्र का विस्तार मध्य एशिया में भी किया हुआ है, इसलिए वे रूस के लिए भी चुनौती रहे हैं। रूस ने इस्लामिक स्टेट को पराजित करने में तो सहयोग दिया, लेकिन मध्य-पूर्व में वह भी अपने प्रभाव का विस्तार करने में लगा है। एक समय इराक से मिस्र तक सोवियत रूस का प्रभाव फैला हुआ था, लेकिन अमेरिका ने सद्दाम हुसैन को समाप्त करके रूस के प्रभाव को बहुत सीमित कर दिया। अब रूस असद को थामे बैठा है और अमेरिका को यह पसंद नहीं है। इसी तरह से रूस कुछ दिन से तालिबान को भी शह देने लगा है, जिससे अफगानिस्तान में अमेरिकी कठिनाइयां बढ़ गई हैं। इन सब कारणों से अमेरिका में रूस विरोधी भावनाएं बढ़ी हैं और अमेरिकी कांग्रेस में शत्रु देशों पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने वाले कानून के तहत रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने का फैसला कर लिया है। इससे रूस की ही नहीं, भारत की भी मुश्किलें बढ़ सकती हैं। क्योंकि इन दिनों दोनों देशों के बीच कई रक्षा समझौते अपने अंतिम चरण में हैं।
रूस से उन्नत हथियारों की खरीद के जो सौदे अंतिम चरण में हैं, उनमें सबसे महत्वपूर्ण एस-400, ट्रियंफ मिसाइल रक्षा कवच है। एस-400, ट्रियंफ एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम 400 किलोमीटर के दायरे में शत्रु की तरफ से आने वाली मिसाइलों, अदृश्य लड़ाकू विमानों और ड्रोन आदि को आकाश में ही समाप्त कर देने में समर्थ है। चीन कई वर्ष पहले रूस से यह मिसाइल रक्षा कवच खरीद चुका है। भारत ने रूस के साथ ऐसे पांच सिस्टम को साढ़े पांच अरब डॉलर में खरीदने का सौदा किया है। इसके अलावा भारत रूस से ऐसी चार फ्रीगेट खरीद रहा है, जो शत्रु को दिखाई नहीं देंगे। यह सौदा चार अरब डॉलर किया गया है। भारत रूस से एक अरब डॉलर के दौ सौ कामोव टी हल्के हेलिकॉप्टर भी खरीद रहा है। इस समझौते के अनुसार उन्हें बाद में भारत में संयुक्त रूप से बनाया जाएगा। भारत और रूस के बीच नाभिकीय क्षमता से संपन्न पनडुब्बी आईएनएस चक्र की खरीद का भी निर्णय हो गया है। भारत उसे डेढ़ अरब डॉलर खर्च करके खरीद रहा है। अगर अमेरिकी प्रतिबंध लग जाते हैं तो अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के माध्यम से इन सौदों का भुगतान खटाई में पड़ जाएगा। भारत और रूस मिलकर ऐसे तरीके निकालने की कोशिश कर रहे हैं, जिनसे प्रतिबंधों के बावजूद इन सौदों पर आंच न आ सके।
इस संबंध में दोनों नेताओं के बीच बातचीत हुई है और उसके सकारात्मक परिणाम भी निकले हैं। इसका संकेत रूस की आधिकारिक टिप्पणी से भी पाया जा सकता है। शिखर वार्ता के बाद रूस की ओर से यह बात विशेष रूप से रेखांकित की गई कि दोनों देशों के बीच सामरिक सहयोग किस ऊंचे स्तर पर होता है, इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि दोनों देशों के रक्षामंत्री निरंतर निकट संपर्क और सहयोग बनाए रखते हैं। पिछले दिनों भारत ने अपने हथियारों की खरीद को बहुमुखी बनाया है। इस समय भारत संसार में हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार है। हथियारों के विश्व व्यापार में उसका हिस्सा 12 प्रतिशत है। कुछ समय पहले तक उसकी अधिकांश खरीद रूस से ही होती थी। अब वह अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी और इस्राइल आदि से भी हथियार खरीद रहा है। फिर भी भारत 62 प्रतिशत हथियारों की खरीद रूस से कर रहा है, 15 प्रतिशत अमेरिका से और 11 प्रतिशत इस्राइल से। अमेरिका से हमारी हथियारों की खरीद में 2008 से अब तक साढ़े पांच सौ प्रतिशत की वृद्धि हुई है। अमेरिका विश्व का सबसे बड़ा हथियारों का निर्यातक देश है। लेकिन हमारे लिए वह रूस की जगह नहीं ले सकता। क्योंकि उसकी हथियारों की बिक्री अनेक शर्तों से जुड़ी रहती है और वह उसकी भू-सामरिक नीति का परिणाम होती है। रूस हमें हथियारों की अत्यंत उन्नत प्रणालियां बेचने में भी नहीं हिचकिचाता। इस शिखर वार्ता से यह संकेत निकलता है कि रूस भारत की रक्षा संबंधी आवश्यकताओं को समझता है। इधर भारत ने अपना रक्षा उद्योग खड़ा करने का संकल्प लिया है। रूस उसमें भी हमारी भरपूर मदद करेगा।
हथियारों के अलावा रूस के साथ हमारे नाभिकीय और ऊर्जा के क्षेत्र में गहरे संबंध हैं। भारत ने रूस के ऊर्जा क्षेत्र में पिछले दिनों काफी निवेश किया है। रूस की तेल गैस की बड़ी ऊर्जा कंपनियां भी भारतीय कंपनियों से सहयोग कर रही हैं। रूस ने भारत में शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए अनेक नाभिकीय संयंत्र लगाए हैं। अब दोनों देशों ने मिलकर इस क्षेत्र में अन्य देशों से भी सहयोग करने का निर्णय लिया है। इस शिखर वार्ता में यह तय हुआ कि दोनों देश बांग्लादेश में मिलकर नाभिकीय संयंत्र लगाएंगे। अन्य देशों के साथ भी इस तरह के सहयोग की संभावना तलाशी जाएगी। हमारे नाभिकीय क्षेत्र के विस्तार में सबसे बड़ी बाधा चीन बना हुआ है। अमेरिका ने व्यावहारिक रूप से भारत को एक नाभिकीय शक्ति के रूप में स्वीकार किए जाने के दरवाजे खोले थे। लेकिन नाभिकीय आपूर्ति समूह की हमारी सदस्यता में एकमात्र बाधा चीन बना हुआ है। हमने रूस पर चीन को अनुकूल करने की जिम्मेदारी डाली थी, लेकिन अब तक उसके कोई परिणाम नहीं निकले।
शिखर वार्ता के समय भारत और रूस के संबंधों को रेखांकित करने के लिए नरेंद्र मोदी ने इंदिरा गांधी द्वारा की गई 1971 की मैत्री संधि का उल्लेख नहीं किया। उन्होंने सन् 2000 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में दोनों देशों के बीच संबंधों को रणनीतिक साझेदारी में बदलने का उल्लेख किया। इसका कारण यह है कि इंदिरा गांधी के समय भारत और सोवियत रूस के बीच हुई मैत्री संधि सोवियत संघ के बिखरने के साथ-साथ लगभग विलीन हो गई थी। 1990 के बाद रूसी नेताओं में भारत को जानने-समझने वाला कोई नेता नहीं था। दोनों के संबंधों में बहाली पुतिन के सत्तारोहण से हुई थी और वाजपेयी और पुतिन के बीच दोनों देशों के संबंध को एक रणनीतिक साझेदारी में बदलने का निर्णय हुआ था। तब से अब तक दोनों देशों के संबंधों में उतार-चढ़ाव आते रहे हैं। भारत के अमेरिका से संबंध सुधरने और रूस के चीन से संबंध सुधरने का दोनों देशों के संबंधों पर भी प्रभाव पड़ा है। चीन एक उभरती हुई शक्ति है और रूस को अमेरिका से प्रतिस्पर्धा में उसकी उपयोगिता दिखाई देती है। चीन के कारण रूस के पाकिस्तान से भी संबंध सुधरे हैं। रूस और पाकिस्तान के बीच बढ़ती नजदीकी भारत की चिंता का विशेष कारण है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कई मुद्दों पर भारत और रूस के बीच असहमति है। दक्षिण चीन सागर विवाद को लेकर रूस पूरी तरह चीन के साथ है। जबकि भारत हिन्द-प्रशांत क्षेत्र को स्वतंत्र और सर्वसुलभ देखना चाहता है। इस सिलसिले में भारत, जापान, आस्ट्रेलिया और अमेरिका के बीच सहयोग भी बना है। भारत को लगता है कि चीन वन वेल्ट-वन रोड परियोजना के जरिये इस क्षेत्र में बंदरगाहों आदि का जाल बिछाकर संसार के सबसे व्यस्त व्यापारिक मार्ग को नियंत्रित करना चाहता है। भारत-चीन की इस कोशिश को सफल नहीं होने देना चाहता। इसी तरह रूस पाकिस्तान को अपने हथियारों के एक नए और बड़े ग्राहक के रूप में देख रहा है। पिछले दिनों रूस ने और पाकिस्तान ने संयुक्त सैनिक अभ्यास भी किया था, जिस पर भारत ने आपत्ति जताई थी। रूस इस्लामिक स्टेट को फैलने से रोकने के लिए तालिबान से बातचीत का भी समर्थक है। भारत मानता है कि तालिबान को ताकतवर बनाना पाकिस्तानी सेना की षड्यंत्रकारी भूमिका को प्रश्रय देना होगा। भारत अनेक बार रूसी नेताओं को अपनी चिंता बता चुका है। लेकिन वह रूस को तालिबान का बचाव करने से विरत नहीं कर पाया।
मध्य-पूर्व की राजनीति में पड़े बिना भारत खाड़ी के सभी देशों से अच्छे संबंध बना रहा है। खाड़ी के देशों में न केवल हमारे 70 लाख लोग काम कर रहे हैं, बल्कि हम अपनी ऊर्जा संबंधी आवश्यकताओं के लिए अधिकांशत: यही के देशों पर निर्भर रहे हैं। भारत की कच्चे तेल की अधिकांश खरीद इराक, सऊदी अरब और ईरान से हो रही है। भारत सीरिया में रूस की राजनीति से अलग-थलग रहा है। लेकिन ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों की आशंका ने उसे कठिनाई में डाल दिया है। इस क्षेत्र में वह ईरान और रूस के साथ त्रिपक्षीय समझौता करके उत्तर-दक्षिण गलियारे को विकसित कर रहा है। ईरान के चाबहार बंदरगाह में भारत की साझेदारी है और वह अफगानिस्तान तक हमारी पहुंच बनाए रखने के लिए आवश्यक है। अपने इन सभी आर्थिक हितों को सुरक्षित रखने के लिए वह रूस से सलाह कर रहा है। अमेरिकी प्रतिबंधों की स्थिति में ईरान में भारतीय हितों की सुरक्षा कैसे हो, यही उसकी चिंता है। अब तक अमेरिका भारतीय हितों का विचार करते हुए भारत को कुछ छूट दिए रहा है। अब भी अमेरिका के रक्षामंत्री सहित अनेक अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञों और नेताओं ने यह कहा है कि रूस और ईरान पर प्रतिबंध लगाते हुए भारत को कुछ छूट दी जानी चाहिए। ऐसा न किया गया तो इससे भारत कमजोर होगा और चीन को संतुलित करने में अमेरिका भारत की जो भूमिका देख रहा है, वह कठिनाई में पड़ेगी। लेकिन अमेरिकी प्रशासन ने अभी अपना रुख स्पष्ट नहीं किया।
राष्ट्रपति पुतिन के साथ अपनी शिखर वार्ता को फलदायी बताते हुए नरेंद्र मोदी ने भारत-रूस रणनीतिक साझेदारी के साथ विशेष जोड़कर उसका महत्व बताने की कोशिश की। दोनों देशों के बीच पिछले दिनों जो उलझनें दिखाई दी हैं, उन्हें इस शिखर वार्ता में दूर करने की कोशिश की गई। इतना स्पष्ट है कि चीन और रूस भारत को अमेरिका से दूर करने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी तरफ अमेरिका भी भारत को रूस से अलग करने की कोशिश में लगा रहा है। भारत सभी देशों से अपने संबंधों को अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार स्वतंत्र दृष्टि से देखता है। इसलिए इस तरह के किसी प्रभाव में आने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। रूस यह कहता रहा है कि भारत से अपने संबंधों को वह एक विशेष श्रेणी में रखता है और अपने अन्य अंतरराष्ट्रीय उलझावों की छाया उस पर नहीं पड़ने देगा। एक-दूसरे को यही भरोसा दिलाने के लिए इस शिखर वार्ता को आवश्यक समझा गया था। आशा की जानी चाहिए कि भारतीय राजनय की इस नई शैली के सकारात्मक परिणाम निकलेंगे। 

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