ईवीएम को लेकर थम नहीं रहा विवाद

इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन एक बार फिर चर्चा में है. देश के कुछ राजनीतिक दल ईवीएम के सहारे कई बार चुनाव जीतने और सत्ता सुख भोगने के बावजूद उसकी निष्पक्षता पर शक जता रहे हैं. जबकि इस बार ज्यादातर ईवीएम में वीवीपैट पर्चियों की व्यवस्था की गई है. हर संसदीय क्षेत्र के सभी विधानसभा क्षेत्रों के पांच-पांच बूथों पर वीवीपैट पर्चियों के औचक मिलान का प्रावधान भी है. बावजूद इसके, अतार्किक विरोध जारी है.

लोकसभा चुनाव के दौरान भी ईवीएम को लेकर विवाद जारी  रहा. बीती नौ मई को यह मामला एक बार फिर देश की सर्वोच्च अदालत में सुनवाई के लिए आया. गुहार लगाने वालों में देश के 21 विपक्षी दलों के नेता थे, जिनकी मांग थी कि अदालत चुनाव आयोग को आदेश दे कि 50 प्रतिशत वीवीपैट पर्चियों का मिलान ईवीएम के साथ किया जाए. सुनवाई के दौरान चंद्र्रबाबू नायडू, फारूक अब्दुल्ला एवं डी राजा जैसे दिग्गज नेता अदालत में मौजूद थे. मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि अदालत यह मामला बार-बार क्यों सुने? वह इस मामले में दखलअंदाजी नहीं करना चाहते. अदालत के इस रुख से याची विपक्षी दलों को जबरदस्त झटका लगा. चूंकि फैसला सर्वोच्च अदालत का था, इसलिए उसका सम्मान करने की बात सबने कही. लेकिन, कुछ नेताओं ने इशारों में, तो कुछ ने खुलकर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर की कि वे अदालत के इस फैसले से संतुष्ट नहीं हैं और ईवीएम को लेकर अपनी लड़ाई जारी रखेंगे.

पहले भी आदेश दे चुका है सुप्रीम कोर्ट

पिछले महीने ही ईवीएम और वीवीपैट पर्चियों के मिलान को लेकर सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग को एक बड़ा आदेश दे चुका है. सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा संसदीय क्षेत्र के हर विधानसभा क्षेत्र में कम से कम पांच बूथों के ईवीएम और वीवीपैट पर्चियों का औचक मिलान करने के लिए कहा था, जिसे चुनाव आयोग ने मान भी लिया था. जबकि इससे पहले यह संख्या सिर्फ एक हुआ करती थी यानी सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इसमें पांच गुना बढ़ोतरी हो गई है, बावजूद इसके, विपक्षी दल संतुष्ट नहीं हैं. नतीजतन, नौ मई को फिर अपनी याचिका लेकर पहुंचने पर अदालत में उन्हें मुंह की खानी पड़ी.

सभी राजनीतिक दल उठा चुके सवाल

साल 2009 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद भारतीय जनता पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के तत्कालीन उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी भी ईवीएम पर सवाल खड़े कर चुके हैं. वर्तमान में भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं राज्यसभा सदस्य जीवीएल नरसिम्हा राव ने तो उस समय इस पर एक किताब तक लिख डाली थी. बाद में राजनीतिक हालात बदले, 2014 में 30 सालों के बाद पूर्ण बहुमत वाली सरकार केंद्र में बनी. नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भाजपा का विजय रथ एक के बाद एक राज्य फतह करता गया और इसी के साथ ईवीएम को लेकर विपक्षी दलों के नेताओं की तल्खी भी बढ़ती चली गई. ऐसे में, सवाल यह खड़ा हो रहा है कि अब क्या होना चाहिए? लेकिन, इस सवाल का जवाब तलाशने से पहले आप यह जानिए कि आखिर देश में ईवीएम आई कैसे?

केरल में पहली बार हुआ इस्तेमाल

देश में पहली बार ईवीएम का इस्तेमाल साल 1982 में केरल के परूर विधानसभा क्षेत्र के 50 मतदान केंद्रों पर किया गया था. बाद में इसका प्रयोग इसलिए नहीं हो पाया, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव में ईवीएम के इस्तेमाल को वैधानिक रूप दिए जाने का आदेश दे दिया. दिसंबर 1988 में संसद ने कानून में संशोधन करके जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में एक नई धारा 61-ए जोड़ दी, जिसके चलते चुनाव आयोग को ईवीएम के इस्तेमाल को लेकर फैसला करने का अधिकार मिल गया. 1990 में केंद्र सरकार ने सभी मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय दलों के प्रतिनिधियों की एक चुनाव सुधार समिति गठित की, जिससे ईवीएम के इस्तेमाल पर विचार करने के लिए कहा गया. केंद्र सरकार ने उस समय एक विशेषज्ञ समिति भी गठित की, जिसमें आरएसी, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन के तत्कालीन अध्यक्ष प्रोफेसर एस संपत, आईआईटी-दिल्ली के प्रोफेसर पीवी इंद्रेशन और इलेक्ट्रोनिक्स अनुसंधान एवं विकास केंद्र्र, तिरुअनंतपुरम के निदेशक डॉ. सी राव कसरवाड़ा शामिल किए गए. इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि ईवीएम छेड़छाड़ से मुक्त हैं यानी चुनाव में इनका इस्तेमाल किया जा सकता है. इसके बाद साल 1992 में संशोधन लागू करने को लेकर अधिसूचना जारी की गई. लेकिन, चुनाव आयोग ने एक बार फिर ईवीएम का मूल्यांकन करने के लिए प्रोफेसर पीवी इंद्र्रेशन, आईआईटी-दिल्ली के प्रोफेसर डीटी साहनी एवं प्रोफेसर एके अग्रवाल वाली एक तकनीकी विशेषज्ञ समिति गठित कर दी. साल 2010 में आयोग ने इस समिति का दायरा बढ़ाकर इसमें दो अन्य विशेषज्ञों, आईआईटी-मुंबई के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर डीके शर्मा और आईआईटी-कानपुर के कंप्यूटर साइंस एवं इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर रजत मूना को शामिल कर लिया. देश में आम चुनाव और राज्यों के विधानसभा चुनाव में ईवीएम का इस्तेमाल आंशिक रूप से साल 1999 में शुरू हुआ और साल 2004 से देश में सारे चुनाव ईवीएम से ही कराए जा रहे हैं.

अब क्या होना चाहिए

साल 1982 से लेकर 2019 तक लगभग सभी राजनीतिक दल देश में शासन कर चुके हैं, सरकार चला चुके हैं. वे लोकसभा के साथ-साथ राज्यों के विधानसभा चुनाव में भी कई बार जीते हैं, तो कई बार हारे भी. ऐसे में, ईवीएम को लेकर सिर्फ सत्तारूढ़ पार्टी और चुनाव आयोग को कठघरे में खड़ा करना आखिर कहां तक जायज है? देश के विपक्षी दलों को इस विषय पर गहन चिंतन-मनन करने की जरूरत है. सवाल यह भी है कि अगर वीवीपैट की 50 प्रतिशत पर्चियों का मिलान ईवीएम से करना ही पड़े, जैसा विपक्षी दल कह रहे हैं, तो फिर बैलेट और ईवीएम में फर्क क्या रह जाएगा? क्या देश फिर से बैलेट पेपर के दौर में लौटने को तैयार है? अगर हार-जीत की वजह से राजनीतिक दल बार-बार चुनावी प्रक्रिया बदलने या प्रभावित करने की मांग करेंगे, तो फिर चुनाव आयोग की भूमिका क्या रह जाएगी? गौरतलब यह है कि जब भी चुनाव आयोग चुनाव सुधारों को लेकर नियमों को पारदर्शी या सख्त बनाने की कोशिश करता है, तो लगभग सभी राजनीतिक दल उसका विरोध करते नजर आते हैं. चुनाव कैसे हो, यह तय करने का अधिकार राजनीतिक दलों को आखिर किस आधार पर दिया जा सकता है? चुनाव आयोग का यह दायित्व है कि अगर उसकी निष्पक्षता को लेकर सवाल उठ रहे हैं और बार-बार उठ रहे हैं, तो उसे अपनी निष्पक्षता के ठोस प्रमाणों के साथ आगे आकर राजनीतिक दलों को कठोर चेतावनी देनी चाहिए. ध्यान रहे, भारतीय संविधान में चुनाव आयुक्त को हटाने का भी प्रावधान है. अगर विपक्षी दलों को लगता है कि जान-बूझ कर पक्षपात किया जा रहा है, तो उनके सामने यह विकल्प खुला हुआ है. लेकिन, ईवीएम विरोध को सिर्फ चुनावी राग बना देना भारतीय लोकतंत्र के लिए हितकर नहीं माना जा सकता. द्द

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